(TALK OF AGREEMENT)समझौते की बात
मुसलमानों पर बड़े से बड़ा जुल्म किया गया, तो जुल्म किया गया कि आज हम में से कोई आदमी सोच नहीं सकता था। क्या यह जुल्म गरीब, बेबस, गुलामों और लौंडियों पर ही नहीं हुआ, बल्कि अमीरों और रईसों, क़ब्ले के सरदारों पर ऐसे ही जुल्म किए गए। हजरत उस्मान बिन अफ्फ़ान, हज़रत अव हुजैफ़ा बिन उतबा, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद, हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़, हज़रत जुबैर बिन अवाम क़ुरैश के प्रसिद्ध और ताक़तवर क़बीलों से ताल्लुक रखते थे, बहादुर थे, इज्ज़तदार थे, लेकिन मुस्लिम होने पर उन्हें भी जुल्म का है निशाना बनाया गया है। मुसलमानों ने निहायत सब्र व शुक्र से सख्तियां झेलीं, जुल्म सहे, पर एक मुसलमान भी इस्लाम से फिरा मुसलमानों के इस जमाव ने काफ़िरों को हैरत में डाल दिया है। चूंकि तबीयतें अलग - अलग होती हैं। कुछ लोग दिल के नर्म होते हैं। और कुछ सख्त, कुछ कुफ्फ़ार ऐसे भी थे, जिन के दिल जुल्म की इस इंस्पेक्शन पर पसीजे। यूनानियों ने संगदिल जालिमों को समझाना शुरू किया। क्या वे भी धार्मिक मुसलमानों पर इनतिई जुल्म व सितम कर के थक चुके थे, नर्मद ग्रस्त थे।
इस से मुसलमानों पर जो सख्तियाँ की जा रही थीं, उन में कुछ कमी हुई। जब अक्सर लोगों ने देखा कि मुस्लिम पिटते हैं, धूप में जलती रेत पर लिटाये जाते हैं, भारी और वज़नी पत्थर उन के सीनों पर रख दिया जाता है, सारा - सारा दिन भूखे - प्यासे रहते हैं और फिर भी इस्लाम को नहीं छोड़े, तो उन्हें रख दिया कि ये इतने मूर्ख नहीं हो सकते। जरूर इस्लाम की तालीम ऐसा कुआ है, जिसे छोड़ना उन्हें पसन्द नहीं है। इस रखने ने बहुत से लोगों को मुस्लिम होने पर उकसाया, चुनांचे वे? छिप कर अरक्म के घरों में पहुंचे। हुजूर सल्ल ० की खिदमत में हाज़िर है। मक्का के काफ़िर चाहते हैं तो यह थे कि मुसलमान फिर काफ़िर हो? जाओ, पर उलटा असर हो रहा था, कि काफ़िर आ कर मुसलमान होते हैं! जा रहे थे।
हर रोज़ कुफ्फ़ार सुन लेते थे कि आज फ्लां शख्स मुसलमान हो गया है और आज प्लून, तो हेत बिगड़ते, गुस्से में होते हैं और हर नए मुस्लिम पर सख्तियाँ करते हैं, पर मुसलमान होने का जो सिलसिला शुरू से था हो गया था, वह न रुका, बल्कि 40 साल जारी कर रहा था। क्या यह देख कर कुफ्फ़ार में बड़ी बेकरारी रहो, विशेष रूप से अब जल, अब अबू लहब, उत्वा वलीद, अबू सुफ़ियान, आस बिन वाइल सहमी और इसी किस्म के बड़े लोगों की लोगो की चिंता बढ़ गयी। बात यह भी थी कि ये लोग न सिर्फ इज्ज़तदार और मालदार थे, बल्कि ये से हर एक किसी न किसी अलमबरदार ओहदे पर था, जैसे अबू सुफ़ियान कुरैश का अल सलादार था, अब्बास हैं हाज़ियों को पानी पिलाते थे, वलीद सवारों का अफ़सर था।
हर्स बिन कैस खजाना का मालिक था और अबू जहल अपने कवीले का सरदार था। क़ुरैश के सरदारो में वही लोगों के हाथ में था। इस्लाम उनकी झठी सरदारी को चुनौती दे रहा था। वे देख रहे थे कि जो आदमी मुसलमान हो जाता है, चाहे कोई भी साझेदार और तब्के का हो, बराबरी का हक़ है, कर हासिल कर लेता है। एक मुसलमान को दूसरे पर कोई बरतरी नहीं रहती। है गुलाम और आक़ा एक ही लाइन में शामिल हो जाते हैं। यह बात उन की मआशरत के खिलाफ़ थी। उस का तरीकाक़ा यह था कि गुलाम सिर्फ खिदमत करता था। क्या ही मर जाने के लिए पैदा हुआ है। वह न अच्छा खा सकता है, न अच्छा पहन सकता है, न आक़ा के साथ उठ बैठ सकता है।
वे समझ रहे थे कि अगर गुलामों को आजादी मिल गयी, उन्हें बराबर के हक़ मिल गए तो उन की बरतरी मिट्टी में मिल जाएगी, इसलिए वे भी इस्लाम और मुसलमानों से दुश्मनी का बर्ताव करते थे, लेकिन जब उन्होंने मुसलमानों की तायदाद बढ़ते देखी, तो घबरा गए। अबू जहल ने फिर मजलिसी शुरा बुलाई। जब सब आ गए, तो उस ने कहा कि बुतों के परस्तारो! अफ़सोस है, हमने शुरू में जो फ़ित्ने को मामुली समझा था, उसने बढ़ कर हमारी सरदारी को चोट देने लगा है। अगर कुछ दिन और ग़ाफ़िल रहे तो अजब नहीं तमाम मक्का और सारा अरब मुस्लिम हो जाए और फिर हमें दौड़ का रास्ता ढूंढना पड़े, हैं या जिन लोगों पर हम हुकूमत करते रहे, उन के महुकूम बन कर रह गए।
क्या यह बात हमारे लिए शर्म की बात नहीं होगी? कम से कम मैं इस बात को किसी भी तरह से सहन नहीं करूंगा। इस वक्त आप लोग मौजूद रहें, या तो मुहम्मद के फ़ित्ने को दूर करने की तदबीर सोचें, वरना मैं साफ़ साफ तोर पर केहता हू कि मैं यहाँ से कही और चला जाऊंगा।
अबू जहल की पूरी मज्मे ने ताईद कर दी।
अबू जहल ने कहा, मुझे हसरत है कि मुहम्मद लोगों पर क्या जादू करता है (नाउजूबिल्लाह) कि वे हजार सितम सहने पर भी इस्लाम से नही फिरते । वलीद ने कहा, वह बड़ा जादूगर है। जो आदमी उस से एक बार बात करता है, उसी पर मोहित हो जाता है। उत्बा बहुत इल्म वाला था, उसे अपनी जुबानदानी पर बड़ा नाज़ था । क्या उस ने कहा, मेरे रखने में वह कुर्सी का भूखा है, इस लिए उस ने कौम में फ़ितना पैदा कर रखा है। अबू लहब बोला, अगर वह कुर्सी चाहती है, या दौलत चाहती है या में किसी महिला पर आशिक है, तो वह जो चाहे, उसे दे दो। अभी तो इस फ़ित्ने को किसी न किसी तरह दबा देना मुनासिब है।
आस ने मूंछें पर ताव दे कर कहा, हरगिज़ नहीं, उसे कुछ भी नहीं दिया जा सकता है। अगर आज हम उस से रौब खा कर, जो मांगे, दे दे, तो कल कोई और उठ खड़ा होगा और परसों कोई। सोचिए, इस तरह से हम क्या - क्या को और क्या - क्या देते रहेंगे।
अबू सुफ़ियान ने कहा, निश्चित रूप से हमें उसे भी कुछ देना चाहिए। क्या हम उस की सरदारी नहीं मान सकते। माबूदों की कसम! हरगिज़ नहीं, मर जाएंगे, उस पर हुकूमत नहीं मानेंगे। वलीद ने कहा, जो फितना हमारे सामने है, वह मामूली नहीं है। हम देख रहे हैं उस दिन - ब - दिन उस के मानने वालों की तादाद बढ़ रही है। हम ने उन पर सख़्तिया कर के देख लिया, कुछ नतीजा नहीं निकला। बेहतर है यही है कि जो वह मांगे, दे दिया जाए।
थोड़ी सी बहस - मुबासे के बाद यह तय हुआ कि उतबा को हजरत मुहम्मद की खिदमत में सफ़ीर (दूत) बना कर भेजा जाए और उसे अख्तियार दिया जाए कि जिस तरह से मुमकिन हो , सुलह कर के हुजूर सल्ल ० को हमवार करे। चुनांचे उत्बा प्रस्थान हुआ और हुजूर सल्ल ० खिदमत में पहुंचा। हुजूर सल्ल ० ने उस का स्वागत किया। उसका एहतराम किया और अपने पास बिठाया।
उत्बा ने कहा, मोहम्मद! मैं आज तमाम क़ुरैश की तरफ से सफ़ीर बन कर हाज़िर हुआ हूँ, कुछ अर्ज करना चाहता हूँ। हुजूर सल्ल ० उसे गौर से देख कर मुस्कराये। आपने कहा कहो तुम क्या करना चाहते हो?
उत्बा ने कहा, आपने अपनी कौम में ऐसा फितना खड़ा कर दिया है, जो आज तक किसी ने नहीं किया है। क्या आप इसे पसन्द करते हैं की मुसलमानो पर रात दिन सख्तिया की जाये?
आपने थोड़ा सांस भर कर कहा, आप नहीं जानते, मुसलमानों पर है जो सख्तियाँ की जाती हैं, उन से मेरा दिल कितना दुखता है ।
उत्बा ने कहा है, फिर आप ऐसी तदबीर क्यों नहीं करते, जिससे वे सख्तियाँ बन्द हो जाएँ?
हजूर सल्ल ० ने फ़रमाया, मैं क्या तदबीर कर सकता हूँ। खुदा की हैं मस्लहत में कोई दम नहीं मार सकता।
उत्बा ने बुरा - सा मुँह बना कर कहा, खुदा का नाम न लो। सारा फ़ित्ना इस खुदा के नाम ही है। आप को तदबीर मैं बताता हूं।
हुज़र सल्ल ० ने पूछा, तदबीर है?
उत्बा ने कहा, आप को तमाम क़ुरैश को अपना सरदार बनाने को तैयार हैं। आप मक्का के बादशाह बन जाओ। तमाम खज़ाना, सब फौज आप की मातहती में दे दी जाएगी। जिस महिला या जिस लड़की से आप कहेंगे, आप की शादी कर दी जाएगी। इस मंसब को कुबूल कर लीजिये ।
हजर सल्ल ० ने कहा, उत्बा! अगर क़ुरैश के सरदारों ने यह समझौता है की मंसब की लालच में और हुकुमत मिलने के ख्याल से इस्लाम की तबलीग़ कर रहा हु तो गलत समझा । खुदा की क़सम! मैं खिदमत ही करना चाहता हूं। मुझे मंसब की आरजू नहीं है। मैं हुकूमत नहीं चाहता। अगर कोई तमन्ना है, तो बस यह कि आप सब मुस्लिम हो जाएं। पत्थर के बुतों को पूजना छोड़ दो। उत्बा! मैं खुदा का रसूल हूँ। मुझ पर खुदा का पैगाम नाज़िल होता है।
हुजूर सल्ल ० ने फिर आयत सुनायी, जिस का तर्जुमा इस तरह है। 'ऐ मुहम्मद! कह दो कि मैं तुझ जैसा आदमी हूं। मुझ पर वाह्य नाज़िल होती है कि तुम्हारा खुदा बस एक खुदा है। पस उस की तरफ़ जाओ है और उस से माफ़ी मांगो।
ये आयतों को सुन कर उत्बा का चेहरा उतर गया | और उसने हैरान हो कर हुजूर सल्ल ० की तरफ़ देखने लगा। हुजूर सल्ल ० ने कहा, उत्बा और सुनो, अल्लाह फ़रमाता है
'(ए मुहम्मद!) कह दो कि क्या तुम लोग अल्लाह का इंकार करते हो? जिस पर दो दिन में यह जमीन पैदा की और आप खुदा का शरीक करार देते हो, वही सारी दुनिया का पालने वाला है।
उत्बा के चेहरे का रंग इन आयतों को सुनकर उड़ गया। वह कांपने। उस ने हुजूर सल्ल ० के मुँह पर हाथ रख कर कहा, बस, वरना मेरा दिल उलट - पलट जाएगा और कलेजा फट जाएगा।
हुजूर सल्ल ० चुप हो गए।
उत्बा उठ कर सीधा कुरेश की मजलिस में पहुँचा।
अबू लहब ने पूछा, उत्बा! क्या रहा?
उत्बा ने कहा, अगर मेरी बात मानो तो यही बेहतर है कि मुहम्मद से कुछ न कहो।
अबू जहल ने हंस कर कहा, क्या तुम पर भी वह जादू कर दिया है! है उत्बा ने कहा जो तुम चाहो कहो। मेरी राय तो यह है कि उन को उन के हाल पर छोड़ दो। अगर वह तमाम अरब पर ग़ालिब आ गया, ता है। क्या यह तुम्हारी इज्जत है, वरना अरब खुद उन को फना कर देंगे।
अबू लहब ने कहा, यह नहीं हो सकता।
अबू सुफियान ने जोश में भर कर कहा, हम को सिर्फ अबू तालिब का पास है, बरना हम खुद उस का खात्मा कर देते।
क्या अबू जहल ने कहा, बेहतर तो मालूम होता है कि एक वफ्द अबू तालिब की खिदमत में जाये और उन से साफ - साफ कह दे कि या तो वह अपने भतीजे को समझा कि वह हमारे माबूदों की तौहीन न करें, वरना हम उसे जरूर क़त्ल कर डालेंगे।
सब ने इस बात की ताईद की और बात हो गयी।
इस कारंवाई के बाद मजलिसे शूरा बरखवास्त कर दि गयी । लोग अपने - अपने घरों को चले गए।
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