कुरैश का वफ्द अबू तालिब की खिदमत में (Quresh Vafad in Abu Talib's Khidmat)
अबू तालिब की खिदमत में वफ्द हाजिर हुआ ।
अबू तालिब ने उन का जोरदार स्वागत किया ।
जब तमाम लोग बैठ गये , तो अबू तालिब ने पूछा , कहिए , आज आप लोगों ने कैसे कष्ट किया ?
अबू जहल ने कहा , मोहतरम बुजुर्ग ! क्या आप को मालूम नहीं कि आप के भतीजे मुहम्मद ने क़ौम में एक नया फ़ित्ना खड़ा कर दिया है । वह कहता है कि खुदा एक है । इतनी बड़ी खुदाई का सिर्फ एक खुदा बताता है । फिर ऐसी हस्ती को खुदा कहता है , जिसे आज तक किसी ने नहीं देखा । हमारे माबूदों की तौहीन करता है । हम आप की खिदमत में इस लिए हजीर हुए हैं कि आप से दरख्वास्त करें कि आप अपने भतीजे को समझा दें कि वह हमारे माबूनों की तौहीन न करे, हमारे बाप दादा के में मजहब को बुरा न कहे और नए मजहब की तब्लीग न करे। आप हाशमी हैं। बुतो के परस्तार हैं। आप का फ़र्ज़ है कि आप दिल व जान से कोशिश कर के उसे समझाएँ।
आप का बहुत - बहुत शुक्रिया, जो आप मेरे पास आ गए। अबूतालिब बोले । मुझे खुद मालूम है कि आपने मेरी भतीजे मुहम्मद पर सख्तियां की हैं, तक्लीफें पहुंचाई हैं, उस का घर से निकलना बन्द किया हैं, उस के मानने वालों को खूब - खुब सताया है ।सोचो, क्या तुम्हारे लिए यह मुनासिब है, ? माबूदो की क़सम! आपने ग़लती की है, बड़ी गलती हैं जो तरीका तुम ने अपनाया है , वह गलत है । जब सख्तिया बर्दाश्त के काबिल नहीं रह जाती है,, तो कमज़ोर से कमजोर इंसान भी मुक़ाबले में आ जाता है । ज़िद बुरी बात होती है । तुमको यह ज़िद है की मुहम्मद तुम्हारे बुतो को बुरा भला न कहे और उसे यह जिद है कि एक अल्लाह की तबलीग़ करे जिद ने काम बिगाड़ रखा है । तुम नर्मी करो, वह खुद ही बाज़ आ जायेगा । मेरी इन बातो से यह न समाज लेना की मैंने अपने बाप - दादा का मज़हब छोड़ रखा है, नहीं मैं मरते दम तक उस पर क़ायम रहूंगा । अपने माबूदों की तौहीन में भी गवारा नहीं कर सकता, लेकिन मेरा तरीका अलग है। मन किसी को मैं बुरा कहूँ, न सुनू । यह तरीका तुम भी अपनाओ ।
हम सख्त सख्तियाँ न करें, अगर वह तबलीग़ बन्द कर दे, वलीद ने कहा ।
मैं आज अपने भतीजे को बुला कर समझाऊंगा, यक़ीन है कि वह मान जायेगा , आप भी सख्तियाँ बन्द कर दो, अबू तालिब बोले।
अबू बख्तरी ने कहा, बेशक यह मश्बीरा माना जा सकता है। अगर मुहम्मद तबलीग़ से बाज़ आ जाये , तो हमें मुसलमानों पर सख्तिया न करना चाहिए।
इस के बाद वफ्द के लोग उठे और चले गए,
वफ्द के लोग आने को तो आ गए। , लेकिन अभी उन्हें इत्मीनान न हुआ था। उन्होंने दूसरे दिन फिर अबू तालिब के पास जाना तय किया ।
जब यह तय हो गया, तो अबू लहब ने कहा, कल हम अबू तालिब से साफ तौर पर यह कहेंगे कि अगर मुहम्मद हमारे मजहब में दाखिल न हुए, हैं तो फिर हम उन को कत्ल कर डालेंगे।
अबू सुफ़ियान तो चाहता ही यही था कि किसी तरह हुजूर सल्ल ० को क़त्ल कर दिया जाए। उस ने कहा, ज़रूर यह कह देना चाहिए और अगर अब तालिब के तौर से भी बाज न आए और हमारे मज़हब में। दाखिल न हों तो हमें तुरंत उन्हें क़त्ल कर देना चाहिए।
अबू लहब ने कहा, बेशक यही होगा। हम अबू तालिब से आखिरी बात करेंगे।
दूसरा दिन आया, वफ्द ने तैयारी शुरू की। सब जमा हुए और अब तालिब की खिदमत में हाज़री दी ।
अबू तालिब ने आदत के मुताबिक उनकी आवभगत की। जब वे इत्मीनान के साथ बैठ गए, तो अब तालिब ने पूछा, आज कैसे तशरीफ़ ले आए , क्या कोई नई बात हो गयी?।
अबू लहब ने कहा, नई कोई बात नहीं। आज हम इस लिए हम हाज़िर हुए हैं कि आप से कहें कि आप अपने भतीजे को हमारे सामने बुलाएं। क्या आप भी समझ गए हैं, हम भी समझ गए हैं। हो सकता है, हम सब के समझाने से वह समझ जाएं।
मुनासिब है, अब तालिब ने कहा है, लेकिन उस के सामने सख्ती से बातें न करें, क्योंकि यह मेरी तौहीन होगी और मैं इसे किसी तरह न सह सकूंगा।
इत्मीनान रखिए, ऐसा न होगा अबू जहल ने कहा है। हम सब आप का एहतिराम करते हैं।
अबू तालिब ने अपने गुलाम को हुजूर सल्ल ० की खिदमत में भेजा।
ज्यादा देर न गुजरी थी कि हुजूर इस शान से तशरीफ़ लाये कि सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे। कंधे पर काली कमली पड़ी थी, हाथ में छड़ी थी। आपने कहा अस्सलाउम अलैकुम ।
अरब में सलाम करने का यह तरीका न था। सब हैरान रह गए।
अबू तालिब ने कहा, मेरे चश्म व चिराग! आओ, मेरे पास बौठो ।
हुजूर सल्ल ० अपने मोहतरम चचा अबू तालिव के पास बौठ गये। ।
बातें होने लगीं।
अबू लहब ने कहा, तुम जानते हो, हम सब मंसब और इज्जत के मालिक हैं। कुरैश के बड़े लोग हैं। जो बात हम ते कर देते हैं, सभी अरब वाले बगैर कुछ कहे सुने उसे मान लेते हैं।
हुजूर सल्ल ० ने कहा, मुझे पता है, तुम ऐसे ही हो।
अबू लहब फिर बोला, हमें कुरचे और मक्का के नुमाया क़बीलों ने तुम्हारे पास भेजा है, इसलिए हम तुम से कोई समझौता कर लें। प्यारे भतीजे! जो फ़ित्ना आप ने अपनी क़ौम में पैदा किया है, उस फ़ित्ने से तमाम क़ौम मुश्किलों में फंस गयी है, आप समझदार हो और क़ौम की मुश्किलों को खूब समझते हो। अपनी क़ौम पर एहसान करो और उस की मुश्किलों को न बढ़ाओ।
मैंने कौम को मुश्किल में तो नहीं डाला, बल्कि मेरी क़ौम ने खुद को मेरे ऊपर सख्तिया की हैं। मुझे कठिनाई में डाल दिया गया है, लेकिन मुझे इस की परवाह नहीं है कि मुझ पर सख्तियाँ की जाएँ। हां, मलाल है तो इस का कि जो लोग इस्लाम कुबल कर चुके हैं, उन पर हर क़िस्म का जुल्म किया है जाता है। हुजूर सल्ल ० ने जवाब दिया।
अबू लहब ने कहा, जरूर! यह हम से ग़लती हुई, लेकिन अब हम समझौते के लिए आए हैं। प्यारे भतीजे! अगर आप को दौलत की जरूरत की है, तो हम सब मिल कर आपके लिए इतनी दौलत जमा कर दें कि आप सब से मालदा बन जायें।
हुजूर सल्ल ० बोले चचा! अगरचे मैं ग़रीब हूँ, लेकिन खुदा की। क़सम! मुझे दौलत की जरूरत नहीं, न मुझे सोना - चांदी चाहिए।
दौलत नहीं चाहिए, तो क्या किसी सुन्दरी से प्रेम हो गया है? अबू लहब ने पूछा । दिखाएँ वह कौन परी है, जिस से आप ब्याह करना चाहते हैं ई हो ? मैं तुम को विश्वास दिलाता हूं कि वह सुन्दरी कोई भी हो , हम उस से तुम्हारी शादी करा के रहेंगे।
क्या आप बोले, ऐ चचा! यह बात भी नहीं है। मुझे किसी सुन्दरी से प्रेम नहीं है।
अबू लहब ने फिर पूछा, अच्छा तो किसी जाह व मंसब की जरूरत है? अगर यह बात है, तो कुरैश आप को अपना सरदार जरूर मु'र्रर कर देंगे ।
आप बोले, मुझे जाह व मंसब की भी ख्वाहिश नहीं।
अबू लहब ने कहा, तो, तुम शायद हुकूमत चाहते हो। अगर यह बात है तो हम तुम को पूरे अरब का बादशाह बनाये देते हैं। पूरे अरब में में आप की हुकमत कायम हो जाएगी ।
हुजूर सल्ल ० ने फ़रमाया, नहीं चचा! मैं हुकूमत नहीं चाहता।
अबू लहब बोला, बस तो तुम कुछ बीमार हो। अगर यह बात है, तो हम आपके इलाज के लिए मशहूर हकीमों को बुला कर इलाज कराते हैं।
आप ने फ़रमाया, अल्लाह की कृपा से मैं बीमार भी नहीं हूं।
अबू लहब ने कहा, तो किसी जिन्न या आसेब का क्या असर है?
इस असर को काहिने दूर कर सकते हैं ।
आप ने कहा , किसी जिन्न या आसेब का भी असर नहीं ।
फिर आखिर क्या बात है , तुम क्या चाहते हो ?
मैं चाहता हूं कि तुम बुतों की पूजा छोड़ दो और उस खुदा की इबादत करो जो पूरी दुनिया का पैदा करने वाला है और जिस के हाथ में इज्जत व दौलत है , मौत और जिंदगी का निज़ाम है और जो हर चीज की कुदरत रखता है , जो बुजुर्ग व बरतर है और पूरी कायनात का बादशाह है ।
इस के बाद आप ने कुरआन की आयते तिलावत कीं ।
वफ्द के तमाम मेम्बर आयतों को सुन कर हैरान रह गये ।
कुछ देर की खामोशी के बाद अबू जहल ने कहा , तो गोया तुम सुलह करने से इंकार करते हो ?
आप ने फ़रमाया , इंकार मैं नहीं करता , बल्कि तुम करते हो । क्यों नहीं तुम खुदा के सामने झुक जाते हो ? और क्यों झूठे खुदाओं को नहीं छोड़ देते ?
अबू लहब ने विगड़ कर कहा , इस लिए कि हम और हमारे बाप दादा इन्हें पूजते रहे हैं । हम ख्याली खुदा की पूजा मरते दम तक नहीं में करेंगे । अब तुम होशियार हो जाओ । हम न सिर्फ तुम्हारा मक्का में रहना मुश्किल कर देंगे , बल्कि तुम को क़त्ल कर डालेंगे ।
अबू लहब को जोश आ गया था । उस ने गुस्से में भर कर अबू तालिब को खिताब किया और कहा , सुनो अबू तालिब ! या तो तुम मुहम्मद का साथ छोड़ो , वरना मुक़ाबले में आ जाओ । अब हम तुम्हारा भी ख्याल न करेंगे । यह क़ौम का मामला है , मज़हब का मामला है , इस में किसी का लिहाज न किया जाएगा । हम आप को सोचने और ग़ौर करने की मोहलत देते हैं । अगर तुम अपने भतीजे का साथ देने से बाज आ गये , तो हम तुमको अपना सरदार माने रहेंगे । और अगर वाज़ न आए तो तुम पर भी सख्तियां करेंगे । अगर तुम ने कल तक यह न कहला भेजा कि तुम मुहम्मद के साथ से हट गये हो , तो फिर तुम्हारे खिलाफ़ भी कारवाई शुरू कर दी जाएगी ।
अबू लहब खड़ा हो गया , उस ने जंग का एलान कर दिया था ।
साथ के दूसरे सरदार भी खड़े हो गये और बिगड़ते हुए रवाना हो गये ।
सब के चले जाने के बाद अबू तालिब ने कहा , प्यारे भतीजे ! तुमने देख लिया कि सारी कौम भड़क उठी है । मैं कमजोर हूं । मैं सारी कौम का मुकाबला नहीं कर सकता । तुम इन की बातें मान लो । मैं अकेला किस - किस का मुक़ाबला कर सकूंगा ।
हुजूर सल्ल० अबू तालिब की इस बात से थोड़ा परेशान हुए । फिर आंखों में आंसू लाकर बोले , चचा ! खुदा की क़सम ! खुदा की क़सम ! अगर ये लोग मेरे एक हाथ पर सूरज और एक हाथ पर चांद रख दें , तब बादशाह के भी मैं अपने फ़र्ज़ से बाज न आऊंगा , यहां तक कि या तो खुदा इस काम को पूरा कर देगा या मैं इस पर काम आ जाउंगा ।
आप की असर भरी आवाज़ ने अबू तालिब पर बड़ा असर डाला ।
उन्हों ने हुजूर सल्ल० से कहा , मेरी जान । फ़िक्र न करो । मेरी है जिंदगी में तेरा कोई बाल टेढ़ा न कर सकेगा ।
यह सुन कर हुजूर सल्ल० की परेशानी दूर हुई ।
आप उठे , चचा को सलाम किया और अपने मकान की ओर रवाना हो गये ।
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