दरें से रिहाई (DAREN SE RIHAEE)
जिस वक्त अक़ील की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गयी थी , मां - बाप और दूसरे मुसलमानों ने ऊंची आवाज से रोना शुरू कर दिया था और उन के रोने की आवाज से संगदिल पहरेदारों को खुशी हुई थी , वे समझे कि अब मुसलमान भूख - प्यास से मरने लगे हैं , उसी वक्त हिशाम महजूमी दरें के क़रीब से गुजर रहा था । उस ने भी मुसलमानों के रोने की आवाज़ सुनी थी ।
हिशाम महजूमी एक रहमदिल इंसान था । उसे मुसलमान और हाशिम क़बीले पर किये गये जुल्म पसन्द न थे । उस ने पहरे वालों से पूछा कि यह दरें से रोने की कैसी आवाज़ आ रही है ?
एक पहरेदार ने हंस कर कहा , इन बेवकूफों के पास ग़ल्ला खत्म हो गया है । शायद कोई बच्चा भूख से तंग आ कर मर गया है ।
हिशाम को पहरेदार की संगदिली पर गुस्सा आया । उस ने कहा , जालिम वशी ! तु इसलिए हंस रहा है कि कोई मुसलमान बच्चा भूखा है, मर रहा है ।
वह फ़ौरन लौटा । उस ने इरादा किया कि आज वह काबे के दरवाजे पर जा कर इस जालिमाना अहदनामा को फाड़ डालेगा , जिस ने मुसलमानों का जीना दूभर कर दिया है ।
लेकिन यह काम आसान न था । अहदनामा को फाड़ डालने का मतलब था तमाम क़बीलों से लड़ाई मोल लेना । इस के बाद वह अपनी नर्मी कि वजह से मुसलमानों पर किये जा रहे जुल्म को बरदाश्त न कर सका , वह अहदनामा को फाड़ कर तमाम कबीलों से मुकाबला करने पर तैयार हो गया ।
हिशाम तेजी से खाना काबा की तरफ़ रवाना हुआ । अभी वह थोड़ी दूर ही गया था कि जुबैर बिन उमैया सामने से नजर आया ।
जुबैर अब्दुल मुत्तलिब का नाती धा । हिशाम ने उसे रोकते हुए कहा जुबैर !
क्या यह इंसाफ़ है कि तुम खाओ - पियो और हर किस्म के लुत्फ़ उठाओ और तुम्हारे नाना और तुम्हारे खानदान वालों और मुसलमानों के छोटे - छोटे बच्चों को एक - एक दाना नसीब न हो और वे भूख से एड़ियां रगड़ - रगड़ कर मर जाएं ।
हिशाम ! तुम नहीं जानते हो मेरे दिल पर कुरैश के जालिमाना कैद व बन्द और मज्लूम मुसलमानों की मुसीबतों का गहरा असर पड़ता है । बार - बार मेरे दिल में आया कि इस जालिमाना अहदनामा को फाड़ कर फेंक दू , जिस से मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है , लेकिन मुझे इल्म है कि अहदनामा के चाक करते ही तमामें क़बीले मुझ पर टूट पड़ेगे और मेरा क़बीला तमाम क़बीलों का मुकाबला न कर पायेगा , इसलिए खामोश है । अगर तुम मेरा साथ दो , तो मैं अभी अहदनामा फ़ाड़ दू । जुबैर ने कहा ।
सुनो जुबैर ! हिशाम बोला , मैं इस वक्त शोबे अबी तालिब से आ रहा हूं । मुसलमान रो रहे हैं , शायद उन का कोई बच्चा भूखा मर रहा है । मुझ से यह बात देखी नहीं जाती , मैं तुम्हारे साथ हु । आओ , हम दोनों मिल कर अहदनामा फाड़ दें ।
चलो , जुबैर ने कहा ।
दोनों चले । जब बाजार के कोने पर पहुंचे , तो उन को मुत - अम बिन अदी और अबुल बख्तरी मिले ।
मुत - अम ने पूछा , कहां जा रहे हो ? जुबैर और हिशाम तुम दुखी क्यों दिखाई दे रहे हो ?
हिशाम ने बताया , मुसलमानों के बच्चे भूख से विलक - विलक कर रो रहे हैं और जान दे रहे हैं । फ़ाक़ा के मारे हुए मां - बाप अपनी औलाद को मौत के मुंह में देख कर खून के आंसू रो रहे हैं । अबुल बख्तरी ! क्या तुम अपने बच्चों को फ़ाक़ा कर के मरता हुआ देख सकते हो ?
नहीं , नहीं देख सकते !
क्या हम इतनी सख्तियाँ बरदाश्त कर सकते हैं , जितनी तीन साल की मुद्दत में मज़लूम मुसलमानों ने बरदाश्त की ? हिशाम ने पूछा ।
कभी नहीं कर सकते । अबुल बख्तरी ने जवाब दिया । मुसलमानों पर जुल्म व सितम की इंतिहा हो चुकी है । हिशाम ! क्या हम इंसान नहीं , जानवर हैं , वशी जानवर ?
नहीं , हम इंसान हैं , मूहजाब इंसान !
फिर यह कहां की इंसानियत है कि हम अपने कबीले वालों को भूखा मार दें । आखिर मुसलमान भी तो इंसान ही हैं । साल भर से तंग दर्रे में मुसीबत को झेल रहे है । अब हमें उन का बाईकाट खत्म कर देना चाहिए ।
बेशक हमें इंसानियत को शर्म दिलाने वाले इस अहदनामे को फाड़ डालना चाहिए अबुल बख्तरी ने कहा ।
हिशाम खुश हो गया और उस ने कहा , आओ , अब हम चार हो जाएगे । अब जालिम और बेरहम कुरैशियों को हमारे मुकाबले की जुरात न हो सकेगी ।
सब अपने - अपने घरों की ओर चले गये और थोड़ी ही देर में हथियार बंद हो कर आ गये । जब वह खाना काबा के करीब पहुंचे , तो जमआ बीन अस्वद हथियार लगाये नेजा हाथ में लिए खड़े थे ।
जमआ बीन अस्वद ने उन लोगों को दूर से देखते ही कहा , अपने माबूदों की कसम ! मैं तुम चारों में से किसी से नहीं डरता । क्या तुम इसलिए । हथियारबंद हो कर आ रहे हो कि मैं इस जालिमाना अहदनामा को चाक न कर सकू , जिस ने गरीब मज्लुम मुसलमानों पर जुल्म व सितम के पहाड़ ६ तोड़ रखे हैं । वही इंसानो ! आज मैं इस अनामा को चाक किये बगैर न रह सकूंगा ।
पहुंचने पर जुबैर ने कहा , जमआ हम इस इरादे से आए हैं , मुसलमानों की तीन साल की सख्तियों ने हमें उन की मदद पर तैयार किया है ।
' जमआ ने खुश हो कर कहा , तब तो आओ , हम सब मिलकर इस नै है काम को अंजाम दें । चनांचे ये सब खाना काबा की तरफ रवाना हुए ।
मज्लुम और सताये हुए मुसलमानों के हमदर्द जब खाना काबा मैं पहुंचे , तो उन्हों ने देखा कि बहुत से बुतपरस्त अपने खुदाओं के सामने सज्दे में पड़े हैं , उन में अबू जहल, अबू सुफ़ियान , उत्बा , वाइल सहमी वगैरह सभी मौजूद थे ।
इन लोगों ने पहले खाना काबा का तवाफ़ किया , फिर एक जगह खड़े हो गये । चूंकि ये लोग कुफ्फ़ार से डरते थे , इसलिए किसी को पहले बोलने की हिम्मत न हुई । देर तक मश्बिरा करते रहे कि शुरूआत कैसे करें ।
जुबैर ने कहा , शुरूआत में करता हूं , तुम मेरा साथ देना ।
सब ने इस बात का इक़रार किया ।
जुबैर ने ऊंची आवाज में कहा , ऐ मक्का वालो ! यह कौन सी इंसानियत व शराफ़त है कि हम , हमारे गुलाम , हमारे जानवर पेट भर कर । खाएं और बनू हाशिम के गरीब मुसलमानों और उन के मासूम बच्चों को खाना - पीना नसीब न हो । यह ऐसा जुल्म है जो किसी क़ौम ने अपने वतनी भाइयों पर न किया होगा । होशियार हो जाओ । आज मैं इस जालिमाना अहदनामे को चाक करता हूं । जिस ने हमारी शराफ़त पर दाग लगा दिया है ।
अबू जहलघबरा कर उठा , झुल्ला कर बोला , खबरदार , जो अहदनामे को हाथ लगाया । जो भी इसे छुएगा उसका सर कलम कर दिया जायेगा ।
तब तक जमआ बोल पड़ा , वह कौन मौत का प्यारा है , जो हमारे सामने आएगा , अगर कोई है , तो हमारे मुकाबले में आए ।
अबू सुफ़ियान बढ़ा और उस ने कहा , मैं हूं । क्या कोई मेरे सामने इस अहदनामा को छूने की जुर्रत कर सकता है । अबुल बख़्तरी ने तलवार खींच कर कहा , अबू सूफ़ियान बकवास बन्द करो , वरना इस तलवार को घार मे जवाब दिया जाएगा । क्या तुम्हारे पत्थर दिल पर अब तक कोई प्रभाव नहीं हुआ कि तीन साल से मुसलमान सख्तिया बरदाश्त कर रहे हैं , जुल्म सह रहे हैं , उपवास कर रहे हैं । अगर तुम को एक समय भी खाना न मिले तो बताओ क्या हालत होगी ?
जो लोग हमारे माबूदों के खिलाफ़ जहर उगलते हैं , हमारे बाप - दादा के धर्म को बुरा कहते हैं , हमारे बुजुर्गों को बेवकूफ़ कहते हैं , उन्हें भूख और प्यास की तक्लीफ़ उठा - उठा कर मरने दो । अबू सुफ़ियान ने कहा ।
सख्तियों की और जुल्म की एक इंतिहा होती है , हिशाम ने कहा , गरीब व मज्लूम बेयार व मददगार मुसलमानों ने बहुत कुछ सितम उठाये हैं बेहद सख्तिया झेलीं , लेकिन अब भूख और प्यास से तड़प - तड़प कर मरने के लिए उन्हें शोबे अबी तालिब में नहीं छोड़ा जा सकता । हिशाम ने कहा ।
अबू जहल बोल पड़ा , मगर हिशाम ! अहदनामे में लिखा हुआ है कि है जब तक मुसलमान अपने बाप - दादा के धर्म में दाखिल न होंगे , बाईकाट बराबर जारी रहेगा और इस अहदनामे पर क़ौम के तमाम बड़ों के दस्तखत हैं ।
बेदर्द जालिमों ने धोखे में इस पर दस्तखत कराये हैं , ज़मआ ने कहा ।
अबू सुफ़ियान को गुस्सा आ गया । बोला , तुम बकवास कर रहे हो ।
सब ने खूब सोच - समझ कर दस्तखत किये हैं ।
हम उस वक्त भी दस्तखत करने को तैयार न थे , जुबैर ने कहा , मगर हमको बताया गया था कि इस से मुसलमानों की तंबीह मक्सूद है , मगर बाक़िाआत बता रहे हैं कि तुम सब उन को मौत के घाट उतार देना चाहते अपने वतन १ हो । यह बहुत बड़ा जुल्म और नाइसाफ़ी है ।
क्या जुबैर ! तुम यह चाहते हो कि अहदनामा की खिलाफ़वज़ कर के लड़ाई - झगड़े की आग भड़कायी जाए ? अबू जहल ने सवाल किया ।
जुबैर ने जोश में आकर कहा , अगर तुम न मानोगे , तो ऐसा ही किया जाएगा ।
अबू सुफ़ियान गरजा , अगर यह बात है तो क्यों न हम तुम्हारा ही खात्मा कर दें ?
हिशाम भी जोश में भर उठा । उसने घूर कर अबू सुफ़ियान को देखते हुए कहा , तुम्हारा यह हौसला हो गया है , तो तलवार निकालो और मैदान में आ जाओ ।
यह कहते ही हिशाम ने तलवार खींचली ।
अबू सुफ़ियान की भी तलवार चमक उठी ।
क़रीब था कि खाना काबा में लड़ाई शुरू हो हो जाए , अबू तालिब आ गये । उन्होंने लड़ने की वजह मालूम की और दोनों के बीच में खड़े हो गये हैं और दोनों को हाथ के इशारे से तलवारें झुका देने के लिए कहा ।
दोनों ने तलवारें झुका दीं ।
तुम दोनों बे - फ़ायदा लड़ रहे हो , अबू तालिब ने बताया , मेरे भतीजे ने खबर दी है कि अहदनामा कीड़े ने खा लिया है । अगर वाक़ई ऐसा है तो अहदनामा की पाबन्दी खुद - ब - खुद खत्म हो जाती है ।
अबू जहल हंसा और उस ने कहा , यह नामुमकिनहै सौ वर्ष तक भी हैं है अहदनामा को कीड़ा नहीं खा सकता ।
अबू जहल ! मैं सिर्फ इसलिए आया कि अगर मेरे भतीजे की इत्तिला सही है , तो अहदनामा की पाबन्दी कुदरती तौर पर खत्म हो गयी . बाईकाट बन्द होना चाहिए । अबू तालिब ने कहा , और अगर यह खबर ग़लत है , तो आप बाईकाट जारी रखें , मैं शाबे अबी तालिब में रहने पर तैयार हूं ।
अबू जहल ने कहा , यह मंजूर है ।
बस , अहदनामा उतार लाइए । अबू जहल अहदनामा उतारने के लिए आगे बढ़ा ।
लोगों की भीड़ बढ़ गयी । अबू जहल जल्दी से अदनामा ले आया । जब उसने उसे खोल कर । देखा , तो हैरान रह गया , यह देख कर कि दीमक उस का एक - एक लफ्ज़ चाट गयी है ।
अबू जहल का चेहरा उतर गया ।
वहां जमा भीड़ भी हैरत में पड़ गयी ।
कुफ्फ़ारे मक्का के हौसलों पर ओस पड़ गयी ।
अबू तालिब को बोलने का मौका मिल मया ,अबू जहल ! मुहम्मद ने ठीक ही कहा था , अहदनामे का एक लफ्ज़ भी बाक़ी नहीं रहा है , इसलिए वायदे के मुताबिक वाईकाट खत्म हो जाना चाहिए ।
अबू जहल झुंझला कर बोला , तुम्हारा भतीजा जादूगर है ( नउजु बिल्लाह ) और जादू के ज़ोर से उस ने अहदनामे के लफ्ज़ उड़ा दिये हैं । जब तक मुसलमान अपने बाप - दादा के धर्म में वापस न आएंगे , बाईकाट जारी रहेगा ।
अबुल बख्तरी को गुस्सा आ गया , अब जो भी इस जालिमाना अहदनामे का नाम लेगा उस की जुबान काट दी जाएगी ।
अबू सुफ़ियान भी भड़क उठा , यह तुम कहते हो ?
हिशाम बिगड़ गया , तुम्हारी क़ौम सही कहती है ।
अबू सुफ़ियान बोला , तुम ज़िद छोड़ दो । अपनी बेजा जिद से तमाम अरब में लड़ाई की आग न भड़काओ ।
अबू तालिब को दखल देना पड़ा , बोले - ऐलोगो ! सुनो और कान खोल कर सुनो । दबने से एक चोटी भो काट लेती है । हम तो इंसान हैं , फिर कमजोर इंसान नहीं , बल्कि हमारा दिल मजबूत है , बाजू मजबूत है , जिदगो की आखिरी सांस तक लड़ सकते हैं । गनीमत जानो कि मेरा भतीजा मुहम्मद ( सल्ल॰ ) बेहद नेक है , वह खूरेंजी को नहीं पसन्द करता । तमाम मुसलमानों ने उन से लड़ाई की इजाजत तलब को , मगर उन्हों ने इजाजत नहीं दो । मुसलमान उन के को इतनी पाबन्दी करते हैं कि सख्तिया बर्दाश्त कर रहे हैं , बच्चों को भूख से एड़ियां रगड़ते हुए देख रहे हैं , लड़ मरने को जी चाहता है , लेकिन इजाजत न मिलने की वजह से मजबूरन खामोश हैं । मगर अब हालत बर्दाश्त के काबिल नहीं है । मुम्किन है मुहम्मद ( सल्ल . ) लडाई की इजाजत दे दे और लडाई शुरू हो जाए । इसलिए अब यह मुनासिब है कि पहरा उठा कर वाईकाट बन्द करो और अगर इंकार करते हो , तो लड़ाई के लिए तैयार हो जाओ । में यहां से वापस जा कर मुहम्मद ( सल्ल . ) की लडाई पर तैयार करूगा ।
तमाम कुफ्फ़ार ने अबू तालिब की बातों को ध्यान से सुना , मशविरा किया और आखिर में यही ते पाया कि अहदनामा दीमक ने चाट लिया है , तो अब इस को पाबन्दी नहीं की जा सकती ।चुनाचे फ़ौरन एलान कर दिया गया कि मुसलमानों का बाईकाट खत्म हो गया है ।
मुसलमानों ने इस खुशखबरी को सुना तो खुश होकर अल्लाहु अकबर का नारा लगाय और तीन साल के लम्बे बाईकाट से उन्हें निजात मिली । वे खुशी - खुशी अपने - अपने घरों को लौट आए ।