Followers

Monday, May 13, 2019

DAREN SE RIHAEE


दरें से रिहाई (DAREN SE RIHAEE)



जिस वक्त अक़ील की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गयी थी , मां - बाप  और दूसरे मुसलमानों ने ऊंची आवाज से रोना शुरू कर दिया था और  उन के रोने की आवाज से संगदिल पहरेदारों को खुशी हुई थी , वे समझे  कि अब मुसलमान भूख - प्यास से मरने लगे हैं , उसी वक्त हिशाम  महजूमी दरें के क़रीब से गुजर रहा था । उस ने भी मुसलमानों के रोने की आवाज़ सुनी थी ।

 हिशाम महजूमी एक रहमदिल इंसान था । उसे मुसलमान और हाशिम क़बीले पर किये गये जुल्म पसन्द न थे । उस ने पहरे वालों से पूछा  कि यह दरें से रोने की कैसी आवाज़ आ रही है ?

 एक पहरेदार ने हंस कर कहा , इन बेवकूफों के पास ग़ल्ला खत्म हो  गया है । शायद कोई बच्चा भूख से तंग आ कर मर गया है ।

हिशाम को पहरेदार की संगदिली पर गुस्सा आया । उस ने कहा ,  जालिम वशी ! तु इसलिए हंस रहा है कि कोई मुसलमान बच्चा भूखा है,  मर रहा है ।

 वह फ़ौरन लौटा । उस ने इरादा किया कि आज वह काबे के दरवाजे पर जा कर इस जालिमाना अहदनामा को फाड़ डालेगा , जिस ने मुसलमानों का जीना दूभर कर दिया है ।

लेकिन यह काम आसान न था । अहदनामा को फाड़ डालने का मतलब  था तमाम क़बीलों से लड़ाई मोल लेना । इस के बाद वह अपनी नर्मी कि वजह से मुसलमानों पर किये जा रहे जुल्म को बरदाश्त न कर सका , वह  अहदनामा को फाड़ कर तमाम कबीलों से मुकाबला करने पर तैयार हो गया ।

हिशाम तेजी से खाना काबा की तरफ़ रवाना हुआ । अभी वह थोड़ी दूर ही गया था कि जुबैर बिन उमैया सामने से नजर आया ।

 जुबैर अब्दुल मुत्तलिब का नाती धा । हिशाम ने उसे रोकते हुए कहा जुबैर !

 क्या यह इंसाफ़ है कि तुम खाओ - पियो और हर किस्म के  लुत्फ़ उठाओ और तुम्हारे नाना और तुम्हारे खानदान वालों और मुसलमानों के छोटे - छोटे बच्चों को एक - एक दाना नसीब न हो और वे भूख से  एड़ियां रगड़ - रगड़ कर मर जाएं ।

 हिशाम ! तुम नहीं जानते हो मेरे दिल पर कुरैश के जालिमाना कैद  व बन्द और मज्लूम मुसलमानों की मुसीबतों का गहरा असर पड़ता है ।  बार - बार मेरे दिल में आया कि इस जालिमाना अहदनामा को फाड़ कर  फेंक दू , जिस से मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है , लेकिन मुझे इल्म है कि  अहदनामा के चाक करते ही तमामें क़बीले मुझ पर टूट पड़ेगे और मेरा  क़बीला तमाम क़बीलों का मुकाबला न कर पायेगा , इसलिए खामोश है ।  अगर तुम मेरा साथ दो , तो मैं अभी अहदनामा फ़ाड़ दू । जुबैर ने कहा ।

 सुनो जुबैर ! हिशाम बोला , मैं इस वक्त शोबे अबी तालिब से आ  रहा हूं । मुसलमान रो रहे हैं , शायद उन का कोई बच्चा भूखा मर रहा है । मुझ से यह बात देखी नहीं जाती , मैं तुम्हारे साथ हु । आओ , हम  दोनों मिल कर अहदनामा  फाड़ दें ।

चलो , जुबैर ने कहा ।
दोनों चले । जब बाजार के कोने पर पहुंचे , तो उन को मुत - अम बिन अदी और अबुल बख्तरी मिले ।
मुत - अम ने पूछा , कहां जा रहे हो ? जुबैर और हिशाम तुम दुखी  क्यों दिखाई दे रहे हो ?

 हिशाम ने बताया , मुसलमानों के बच्चे भूख से विलक - विलक कर रो  रहे हैं और जान दे रहे हैं । फ़ाक़ा के मारे हुए मां - बाप अपनी औलाद को  मौत के मुंह में देख कर खून के आंसू रो रहे हैं । अबुल बख्तरी ! क्या तुम  अपने बच्चों को फ़ाक़ा कर के मरता हुआ देख सकते हो ?

नहीं , नहीं देख सकते !

 क्या हम इतनी सख्तियाँ बरदाश्त कर सकते हैं , जितनी तीन साल की मुद्दत में मज़लूम मुसलमानों ने बरदाश्त की ? हिशाम ने पूछा ।

 कभी नहीं कर सकते । अबुल बख्तरी ने जवाब दिया । मुसलमानों पर  जुल्म व सितम की इंतिहा हो चुकी है । हिशाम ! क्या हम इंसान नहीं , जानवर हैं , वशी जानवर ?

नहीं , हम इंसान हैं , मूहजाब  इंसान !

 फिर यह कहां की इंसानियत है कि हम अपने कबीले वालों को भूखा मार दें । आखिर मुसलमान भी तो इंसान ही हैं । साल भर से तंग दर्रे में मुसीबत को झेल रहे है । अब हमें उन का बाईकाट खत्म कर देना चाहिए ।

 बेशक हमें इंसानियत को शर्म दिलाने वाले इस अहदनामे को फाड़ डालना चाहिए अबुल बख्तरी ने कहा ।

हिशाम खुश हो गया और उस ने कहा , आओ , अब हम चार हो  जाएगे । अब जालिम और बेरहम कुरैशियों को हमारे मुकाबले की जुरात  न हो सकेगी ।

बेहतर यह है कि हम हथियारबन्द होकर चलें ताकि कबीले समझ लें कि हर तरह से हम तैयार हैं , मुतइम ने कहा । अगर हम से कोई जरा भी  बोलेगा , तो खून की नदियां बह जाएंगी । सब ने इस राय को पसन्द किया ।

सब अपने - अपने घरों की ओर चले गये और थोड़ी ही देर में हथियार बंद हो कर आ गये । जब वह खाना काबा के करीब पहुंचे , तो जमआ बीन अस्वद हथियार लगाये नेजा हाथ में लिए खड़े थे ।

 जमआ बीन अस्वद ने उन लोगों को दूर से देखते ही कहा , अपने माबूदों की कसम ! मैं तुम चारों में से किसी से नहीं डरता । क्या तुम इसलिए ।  हथियारबंद हो कर आ रहे हो कि मैं इस जालिमाना अहदनामा  को चाक  न कर सकू  , जिस ने गरीब मज्लुम मुसलमानों पर जुल्म व सितम के पहाड़ ६ तोड़ रखे हैं । वही इंसानो ! आज मैं इस अनामा को चाक किये  बगैर न रह सकूंगा  ।

पहुंचने पर जुबैर ने कहा , जमआ हम इस इरादे से आए हैं , मुसलमानों  की तीन साल की सख्तियों ने हमें उन की मदद पर तैयार किया है ।

' जमआ ने खुश हो कर कहा , तब तो आओ , हम सब मिलकर इस नै है काम को अंजाम दें । चनांचे ये सब खाना काबा की तरफ रवाना हुए ।

 मज्लुम और सताये हुए मुसलमानों के हमदर्द जब खाना काबा मैं पहुंचे , तो उन्हों ने देखा कि बहुत से बुतपरस्त अपने खुदाओं के सामने  सज्दे में पड़े हैं , उन में अबू जहल, अबू सुफ़ियान , उत्बा , वाइल सहमी  वगैरह सभी मौजूद थे ।

 इन लोगों ने पहले खाना काबा का तवाफ़ किया , फिर एक जगह खड़े  हो गये । चूंकि ये लोग कुफ्फ़ार से डरते थे , इसलिए किसी को पहले बोलने  की हिम्मत न हुई । देर तक मश्बिरा करते रहे कि शुरूआत कैसे करें ।

 जुबैर ने कहा , शुरूआत में करता हूं , तुम मेरा साथ देना ।

 सब ने इस बात का इक़रार किया ।

 जुबैर ने ऊंची आवाज में कहा , ऐ मक्का वालो ! यह कौन सी इंसानियत व शराफ़त है कि हम , हमारे गुलाम , हमारे जानवर पेट भर कर ।  खाएं और बनू हाशिम के गरीब मुसलमानों और उन के मासूम बच्चों को  खाना - पीना नसीब न हो । यह ऐसा जुल्म है जो किसी क़ौम ने अपने वतनी भाइयों पर न किया होगा । होशियार हो जाओ । आज मैं इस जालिमाना अहदनामे को चाक करता हूं । जिस ने हमारी शराफ़त पर दाग लगा दिया है ।

अबू जहलघबरा कर उठा , झुल्ला कर बोला , खबरदार , जो अहदनामे को हाथ लगाया । जो भी इसे छुएगा उसका सर कलम कर दिया जायेगा ।

  तब तक जमआ बोल पड़ा , वह कौन मौत का प्यारा है , जो हमारे  सामने आएगा , अगर कोई है , तो हमारे मुकाबले में आए ।

अबू सुफ़ियान बढ़ा और उस ने कहा , मैं हूं । क्या कोई मेरे सामने इस  अहदनामा को छूने की जुर्रत कर सकता है ।  अबुल बख़्तरी ने तलवार खींच कर कहा , अबू सूफ़ियान बकवास बन्द करो , वरना इस तलवार को घार मे जवाब दिया जाएगा । क्या तुम्हारे  पत्थर दिल पर अब तक कोई प्रभाव नहीं हुआ कि तीन साल से मुसलमान सख्तिया बरदाश्त कर रहे हैं , जुल्म सह रहे हैं , उपवास कर रहे हैं । अगर  तुम को एक समय भी खाना न मिले तो बताओ क्या हालत होगी ?

जो लोग हमारे माबूदों के खिलाफ़ जहर उगलते हैं , हमारे बाप - दादा   के धर्म को बुरा कहते हैं , हमारे बुजुर्गों को बेवकूफ़ कहते हैं , उन्हें भूख और   प्यास की तक्लीफ़ उठा - उठा कर मरने दो । अबू सुफ़ियान ने कहा ।

सख्तियों की और जुल्म की एक इंतिहा होती है , हिशाम ने कहा ,  गरीब व मज्लूम बेयार व मददगार मुसलमानों ने बहुत कुछ सितम उठाये  हैं बेहद सख्तिया झेलीं , लेकिन अब भूख और प्यास से तड़प - तड़प कर मरने  के लिए उन्हें शोबे अबी तालिब में नहीं छोड़ा जा सकता । हिशाम ने कहा ।

अबू जहल बोल पड़ा , मगर हिशाम ! अहदनामे में लिखा हुआ है कि है जब तक मुसलमान अपने बाप - दादा के धर्म में दाखिल न होंगे , बाईकाट बराबर जारी रहेगा और इस अहदनामे पर क़ौम के तमाम बड़ों के दस्तखत हैं ।

 बेदर्द जालिमों ने धोखे में इस पर दस्तखत कराये हैं , ज़मआ ने कहा ।

अबू सुफ़ियान को गुस्सा आ गया । बोला , तुम बकवास कर रहे हो ।

 सब ने खूब सोच - समझ कर दस्तखत किये हैं ।

 हम उस वक्त भी दस्तखत करने को तैयार न थे , जुबैर ने कहा , मगर  हमको बताया गया था कि इस से मुसलमानों की तंबीह मक्सूद है , मगर बाक़िाआत बता रहे हैं कि तुम सब उन को मौत के घाट उतार देना चाहते अपने वतन १ हो । यह बहुत बड़ा जुल्म और नाइसाफ़ी है ।

 क्या जुबैर ! तुम यह चाहते हो कि अहदनामा की खिलाफ़वज़ कर   के लड़ाई - झगड़े की आग भड़कायी जाए ? अबू जहल ने सवाल किया ।

जुबैर ने जोश में आकर कहा , अगर तुम न मानोगे , तो ऐसा ही किया  जाएगा ।

 अबू सुफ़ियान गरजा , अगर यह बात है तो क्यों न हम तुम्हारा ही  खात्मा कर दें ?

 हिशाम भी जोश में भर उठा । उसने घूर कर अबू सुफ़ियान को देखते हुए कहा , तुम्हारा यह हौसला हो गया है , तो तलवार निकालो और मैदान  में आ जाओ ।

 यह कहते ही हिशाम ने तलवार खींचली ।

अबू सुफ़ियान की भी तलवार चमक उठी ।

 क़रीब था कि खाना काबा में लड़ाई शुरू हो हो जाए , अबू तालिब आ  गये । उन्होंने लड़ने की वजह मालूम की और दोनों के बीच में खड़े हो गये हैं और दोनों को हाथ के इशारे से तलवारें झुका देने के लिए कहा ।

 दोनों ने तलवारें झुका दीं ।

 तुम दोनों बे - फ़ायदा लड़ रहे हो , अबू तालिब ने बताया , मेरे भतीजे ने   खबर दी है कि अहदनामा कीड़े ने खा लिया है । अगर वाक़ई ऐसा है तो अहदनामा  की पाबन्दी खुद - ब - खुद खत्म हो जाती है ।

 अबू जहल हंसा और उस ने कहा , यह नामुमकिनहै  सौ वर्ष तक भी हैं है अहदनामा को कीड़ा नहीं खा सकता ।
अबू जहल ! मैं सिर्फ इसलिए आया  कि अगर मेरे भतीजे की इत्तिला सही है , तो अहदनामा की पाबन्दी कुदरती तौर पर खत्म हो गयी . बाईकाट बन्द होना चाहिए । अबू तालिब ने कहा , और अगर यह खबर  ग़लत है , तो आप बाईकाट जारी रखें , मैं शाबे अबी तालिब में रहने पर  तैयार हूं ।

अबू जहल ने कहा , यह मंजूर है ।

 बस , अहदनामा उतार लाइए । अबू जहल अहदनामा उतारने के लिए आगे बढ़ा ।

लोगों की भीड़ बढ़ गयी । अबू जहल जल्दी से अदनामा ले आया । जब उसने उसे खोल कर । देखा , तो हैरान रह गया , यह देख कर कि दीमक उस का एक - एक लफ्ज़ चाट गयी है ।

अबू जहल का चेहरा उतर गया ।

वहां जमा भीड़ भी हैरत में पड़ गयी ।

कुफ्फ़ारे मक्का के हौसलों पर ओस पड़ गयी ।

अबू  तालिब को बोलने का मौका मिल मया ,अबू जहल ! मुहम्मद ने ठीक ही कहा था , अहदनामे का एक लफ्ज़ भी बाक़ी नहीं रहा है , इसलिए वायदे के मुताबिक वाईकाट खत्म हो जाना चाहिए ।

 अबू जहल  झुंझला कर बोला , तुम्हारा भतीजा जादूगर है ( नउजु बिल्लाह ) और जादू के ज़ोर से उस ने अहदनामे के लफ्ज़ उड़ा दिये हैं ।  जब तक मुसलमान अपने बाप - दादा के धर्म में वापस न आएंगे , बाईकाट  जारी रहेगा । 

अबुल बख्तरी को गुस्सा आ गया , अब जो भी इस जालिमाना अहदनामे  का नाम लेगा उस की जुबान काट दी जाएगी ।

अबू सुफ़ियान भी भड़क उठा , यह तुम कहते हो ?

हिशाम बिगड़ गया , तुम्हारी क़ौम सही कहती है ।

अबू  सुफ़ियान बोला , तुम ज़िद छोड़ दो । अपनी बेजा जिद से तमाम अरब में लड़ाई की आग न भड़काओ । 

अबू तालिब को दखल देना पड़ा , बोले -  ऐलोगो ! सुनो और कान खोल कर सुनो । दबने से एक चोटी भो काट लेती है । हम तो इंसान हैं , फिर कमजोर इंसान नहीं , बल्कि हमारा  दिल मजबूत है , बाजू मजबूत है , जिदगो की आखिरी सांस तक लड़ सकते हैं  । गनीमत जानो कि मेरा भतीजा मुहम्मद ( सल्ल॰ ) बेहद नेक है , वह  खूरेंजी को नहीं पसन्द करता । तमाम मुसलमानों ने उन से लड़ाई  की इजाजत तलब को , मगर उन्हों ने इजाजत नहीं दो । मुसलमान उन के  को इतनी पाबन्दी करते हैं कि सख्तिया बर्दाश्त कर रहे हैं , बच्चों को  भूख से एड़ियां रगड़ते हुए देख रहे हैं , लड़ मरने को जी चाहता है , लेकिन इजाजत  न मिलने की वजह से मजबूरन खामोश हैं । मगर अब हालत  बर्दाश्त के काबिल नहीं है । मुम्किन है मुहम्मद ( सल्ल . ) लडाई की इजाजत  दे दे और लडाई शुरू हो जाए । इसलिए अब यह मुनासिब है कि पहरा उठा कर वाईकाट बन्द करो और अगर इंकार करते हो , तो लड़ाई के लिए तैयार हो जाओ । में यहां से वापस जा कर मुहम्मद ( सल्ल . ) की लडाई पर तैयार करूगा ।

 तमाम कुफ्फ़ार ने अबू तालिब की बातों को ध्यान से सुना , मशविरा किया और आखिर में यही ते पाया कि अहदनामा दीमक ने चाट लिया  है , तो अब इस को पाबन्दी नहीं की जा सकती ।चुनाचे फ़ौरन एलान कर दिया गया कि मुसलमानों का बाईकाट खत्म  हो गया है । 

मुसलमानों ने इस खुशखबरी को सुना तो खुश होकर अल्लाहु अकबर का नारा लगाय और तीन साल के लम्बे बाईकाट से उन्हें निजात मिली । वे खुशी - खुशी अपने - अपने घरों को लौट आए ।

@Alam_E_Ainah

Friday, May 3, 2019

DIL HILA DENE WALA JULM

दिल हिला देने वाला जुल्म  (dil hila dene vaala julm)


कुफ्फ़ारे कुरैश ने जो अदनामा तैयार कर के काबे के दरवाजे पर  लटकाया था , उस में बातें तो बहुत कुछ लिखी थीं , लेकिन जिक्र करने  लायक़ कुछ ही बातें थीं । एक तो यह कि जब तक मुसलमान इस्लाम से  फिरे नहीं और बुतपरस्ती न अपनाएं , बाईकाट बराबर जारी रहेगा । दूसरे  जो लोग हुजूर सल्ल० के पास रहेंगे या उन का साथ देंगे , जैसे अबू तालिब है  वगैरह , उन का भी बाईकाट बराबर जारी रहेगा । कबीला बनू हाशिम से  अबू लहब को छोड़ कर , मेल - जोल , शादी - ब्याह और लेन - देन वगैरह सब  उस वक्त तक बन्द रहेगा , जब तक अबू तालिब मुहम्मद सल्ल० का साथ न  छोड़ दें । ये और इसी क़िस्म के बहुत से कायदे उस में दर्ज थे ।


काबे के दरवाजे पर अहदनामा लटकाये  जाने से तमाम लो उस अहदनामे का  एहतिराम करना शुरू कर दिया । इस बाईकाट की बुनियाद  पर आमख्याल ही पाया जाने लगा कि अब मुसलमानों के दिमाग ठीक  हो जाएंगे , वे टूटेंगे , इस्लाम छोड़  देंगे , इसलिए वह हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा । 



दुनिया की तारीख में इस किस्म के बाईकाट की मिसाल  इससे पहले  नहीं मिलती कि खुद वतन वालों ने किसी गिरोह के लिए जबरदस्त बाईकाट किया हो कि लोग दाने - दाने को मुहताज हो जाए । 



 दर्रा  अगरचे लम्बा - चौड़ा न था , पर इस में दिलचस्पी का कोई सामान न था , न जरूरत न जिदगी की कोई भी पैदा होती था । मुसलमान निहायत तंगी से मजबूरी की हालत में अपनी जिदगी  के दिन काट रहे थे ,  खाने - पीने का सामान काफी था , यह मालुम न था कि बाईकाट कब तक रहेगा , इसलिए खाने - पीने में बड़ी एहतियात करते थे । मुसलमानों के साथ  बच्चे भी थे , औरतें , बूढ़े  और जवान भी थे । 


नौजवान तो भूख और इसलिए वह  प्यास बर्दाशत  कर सकते थे , पर बूढ़े और बच्चे न कर सकते थे  । मजबूरी  सब कुछ करा देती है । बेचारे बर्दाशत कर रहे थे । या  बर्दाशत  करने की  आदत डाल रहे थे । सन् ०७ नबवी के मुहर्रम के महीने से यह बाईकाट शुरु  हुआ था । अब जिलहिज्जा आ गया था , गोया पुरा एक साल बाईकाट  जारी रहा ।


 मुसलमान भूख और प्यास की शिद्दत से निढाल  और बे-हाल हो रहे  थे । जो सामान ले आये थे , वह खत्म हो गये थे और सामान कौन लाता  और किस तरह से लाता । मजबुरी से मुसलमान पेड़ के पत्ते  खा कर दिन  काट रहे थे ।

 चूंकि जिलहिज्जा के महीने में हज  होता है । हज के दिनों में हर आदमी पर से पाबन्दियां उठा दी जाती थी , इसलिए मुसलमानों पर से  पाबन्दियां उठा ली जाती है । घेराव उठा लिया गया । मुसलमान दर्रे  से बाहर  निकले इस हाल में कि तन पर फटे - पुराने कपड़े थे , भूख  से कमजोर और निढाल थे , चलते हुए लड़खड़ाते थे ।जालिम से जालिम आदमी भी इस  हालत को देखकर रहम खा सकता था , मगर कुफ्फारे  मक्का के दिल में  रहम नाम की कोई चीज जैसे बाकी न रह गई हो  वे जरा भी न  पसीजे ।

 मुसलमानों ने सबसे पहले काबा  में जाकर नमाज पढ़ी । तवाफ  किया , हज से फारिग होकर बाजारों में खरीद में रोल लिए गए ।

अबू जहल  साथ गया । बावजूदे कि आज हज का दिन था . कोई  मनाही न थी , लेकिन वह आज भी लोगों को मुसलमानों के हाथ चीजें बेचने से  मना कर रहा था ।

 तमाम कुफ्फार अबू जहल की तरह ज़ालिम न थे , ज्यादातर लोग ने  मुसलमानों की हालत पर रहम खा कर उन के हाथ सामान बेचा । शाम  तक मुसलमान जितना सामान ले सकते थे ले आए और इस के बाद फिर  दरें में चले गए और पाबन्दी लग गयी ।

जब तक मुसलमानों के पास खाने - पीने का सामान रहा , एहतियात से  थोड़ा - थोड़ा खाते रहे , पर जब खाने - पीने का सामान खत्म होने लगा , तो है फिर फ़ाक़ों की नौबत आ गयी । मुसलमान खुद कम खाते , बच्चों को  अच्छी तरह खिलाते , मगर अच्छी तरह क्या खिलाते , सिर्फ एक वक्त थोडा सा सत्तू घोल कर पिलाते थे । रात और दिन में सत्तू के कुछ घूंट  क्या सहारा देते , कुछ ही घंटों बाद फिर भूख लग जाती । खाने के लिए बच्चे चिल्लाते , जिद करते , रोते लेकिन खाना कहां था , जो दिया जाता । उन्हें बहलाया जाता । सुबह कहते कि शाम को खाना मिलेगा , बच्चे शाम के इन्तिजार में चुप हो जाते , मगर जब शाम हो जाती , खाना न मिलता , भूख  ज्यादा लगती तो फिर रो कर खाना मांगते थे । उन के रोने से हर मुसलमान का दिल मुतास्सिर होता था , मगर कर क्या सकते थे ? खाना कहां है ।  कैसे उन को खिलाते ? तमाम बच्चे सूख कर कांटा हो गये थे । 

कुरेश  की जालिमाना पाबन्दी से , मुसलमानों की जिदगी अजीरन हो  गयी थी । वे हुज़र सल्ल० से लड़ाई की इजाजत मांगते थे और आप इजाजत न देते थे । बगैर हुजूर सल्ल० की इजाजत के वे काम न करते थे । सब्र व इस्तिक्लाल से वे सख्तियां बर्दाश्त कर रहे थे ।

 सन् ०८ नबवी का साल सख्त गुज़रा , फिर हज का जमाना आया और  मुसलमानों के ऊपर से निगरानी उठा ली गयी । मुसलमान दरे से बाहर  आए । इस बार वे ज्यादा कमज़ोर और निढाल थे ।

 कुफ़ारे मक्का ने उन की यह हातल देखी , तो वे हंसे और उन में से हैं । अक्सर लोगों ने कहा , मुसलमानो ! क्यों इतनी सख्तियां बर्दाश्त कर रहे  हो ? यह क्या ज़िदगी है ? न खाने को रोटी है , न पहनने को कपड़ा , अफ़सोस है ऐसी जिंदगी पर । तुम हमारे भाई हो । हम को तुम्हारी हालत  देख कर अफ़सोस होता है । मुहम्मद सल्ल० का साथ छोड़ दो । बाप - दादा का मज़हब अपना लो । तुम्हारे लिए जिंदगी की जरूरतें पूरा  कर दी जाएंगी ।

मुसलमानों ने जवाब दिया , हम ने खुदा को पा लिया है , उस का मज़हब  अपनाया है । तुम हम पर चाहे जितना जुल्म  करो  , खाना  न दो  , पानी न दो  , जब तक जी चाहे , बाइकोट  किये रहो , हम  इस्लाम का रास्ता  न छोड़ेंगे ।

 कुफ्फ़ारे मक्का को यह जवाब बहुत नागवार गुजरा और उन्होंने कहा ,  अगर तुम मरना ही चाहते हो , तो सिसक - सिसक कर मरो , हम कर ही क्या सकते है ?

मुसलमानों ने हज किया । हज से फारिग  होने के बाद बाजार में पहुंचे , कुछ सामान वगैरह खरीदा और फिर वह दरें में चले आए , फिर पहरा  कायम कर दिया गया ।

 इस बार पिछले वर्षों के मुकाबले में ज्यादा सख्ती की गयी । दिन  गुजरने लगे । सन् ०६ नबवी शुरू हो गया । यह साल मुसलमानों पर बहुत सख्त गुज़रा । खाने - पीने को सामान बहुत जल्द खत्म हो गया और फ़ाक़ों पर नौबत आ पहुंची । मर्द और औरतें तो फ़ाक़ा करते - करते घास हैं और पेड़ों के पत्ते और छाल वगैरह जो मिल गयी थी , खा लेते थे , पर बच्चे ये चीजें न खाते थे , वे रोते थे , सत्तू के एक घुट के लिए खजूर के  एक दाने के लिए तरसते थे । भूख से बेताब हो कर बेहोश हो जाते थे ।  उन्हें मौत से क़रीब और जिन्दगी से दूर देख कर मां - बाप के कलेजे मुंह  को आते थे , पर सब्र की सिल सीने पर रख कर खुदा की रहमत का  इंतिज़ार कर रहे थे । मुसलमानों ने अपने चमड़े के मोज़ों को पानी में भिगो कर नर्म किया फिर भून कर कर बच्चों को खिला दिया , यहां तक  कि चमड़े के मोजे भी खत्म हो गये , और बच्चे भूख से बेताब हो गये , लेकिन मुसलमान बेचारे करते भी तो क्या करते ।

अक़ील उम्र में सबसे छोटा बच्चा था । भूख ने उस को इतना कमजोर कर दिया था कि उठ न सकता था । हर वक्त पत्थर की चट्टान पर पड़ा  रहता था । मां - बाप और उस की इस हालत को देखते , लेकिन वे करते  ही क्या ।

 अक़ील पर ग़फ़लत तारी हो गयी । मां का कलेजा प्यारे बेटे को  ग़ाफ़िल देख कर टुकड़े - टुकड़े हुआ जा रहा था । अक़ील बीमार न था , बल्कि भूख की ज्यादती ने उसे मौत के किनारे पहुंचा दिया था ।

अक़ील ने आंख खोली , हसरत भरी नज़रों से मां को देखा । मां तड़प गयी । उस ने अपने जिगर के टुकड़े को गोद में ले कर सीने से लगाया , मुह चूमा और बोली , बेटा अक़ील ! क्या तुम मुझे दगा दे जाओगे ? ऐ अल्लाह ! भेरे बने को बना ले , आह , मेरा बच्चा  भूख से दम तोड़ रहा  है । लोगो ! मैं कैसे जब्त करू ?

दर्दमन्द मां ने यह कहते ही बे - अख्तियार रोना शुरू कर दिया ।  लोग उसके पास बैठे थे , उन के भी आंसु जारी हो गये । 

अकोल ने अपनी मां के गले में बाहें डाल कर निहायत कम है ।  आवाज में कहा , मा भूख ‘ रोटी ।

अकील बेहोश हो गया । मां के भी आंसु जारी हो गये । उस ने  सिसकियां भरते हुए कहा , आह , क्या चीज खाने को दें ? हाय मेरे बच्चे ! केसे में तुझे बचाऊ ? अल्लाह ! रहम कर मेरे बच्चो पर , मैं अपने बच्चो को  भूख से तड़प - तड़प कर मरते हुए कैसे देखें ?

पास ही अक़ील का बाप भी बच्चे की हालत देख कर रो रहा था ।

अक़ील की हालत बद से बदतर हो गयी , आंखें बन्द होने लगीं । मां बाप  तड़प गये यह देख कर कि अक़ील का आखिरी वक्त आ गया है । मां  जब्त न कर सकी . अपना सर पत्यर पर दे मारा , खून का दरिया बह निकला । दूसरी औरतों ने लपककर उसे संभाला । अकील का बाप अपनी  बीवी की हालत पर जब्त न कर सक ।  फूट - फूट कर रोने लगा ।

तमाम औरतों और बच्चों पर इस का बेहद असर हुआ । सब जोर जोर से रोने लगे । रोने की आवाज दरें में गुंज कर बाहर निकली । संगदिल पहरेदार रोने की आवाज़ सुन कर खुश हो गये । उन्होंने कहा , । अब ये लोग मरने लगे है , यक़ीनन कोई मर गया है , जो ये लोग रो रहे हैं   । यकीन है कि अब ये सब बाप - दादा के मजहब में आ जाएंगे या भूख  प्यास से मर जाएंगे । 

अक़ील और उस की मां की हालत चिन्ता मे डालने वाली बनती जा  रही थी । 

अबू तालिब भी पास बैठे देख रहे थे । उन से जब्त न हो सका ।

वह  उठ कर आप के पास पहुंचे । हुजूर सल्ल० सज्दे में पड़े हुए थे । कुछ देर ।  बाद जब आप ने सज्दे से सर उठाया , तो अबू तालिब ने कहा , मेरे प्यारे  भतीज ! अव हालात बहुत खराब हो गये हैं , सत्र का दामन हाथ से छूटने  वाला है । बच्चे भूख के मारे मरने वाले हैं । मैं कुरेश से जा कर रहम   की दरख्वास्त करता हूं ।

 आप ने फ़रमाया , चचा ! मुझे खुदा ने खबर दी है कि जो जालिमाना  अदह नामा लिखवाया गया था , उसे कीड़े ने खा लिया है । जिस जगह  अल्लाह का नाम लिखा है , वही बची है । थोड़ा और रुक जाइये , अल्लाह यक़ीनन मदद करेगा ।

 अबू तालिव ने कहा , अच्छा , और मैं थोड़ी देर इन्तिजार करूंगा ।

हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया , आओ , अक़ील को देखें । मैं ने उस के लिए दुआ की है ।

 दोनों उठ कर चले । जब वे अकील के पास पहुंचे , तो वह ग़फ़लत में  था । हुजूर सल्ल० बैठ गये । आप ने उसे अपनी गोद में उठा लिया । ठीक  उसी वक्त हज़रत ख़दीजा एक हाथ में कुछ दूध और दूसरे हाथ में कुछ खाना लिए हुए आयीं । उन्होंने फ़रमाया , मेरे भतीजे हकीम ने यह सामान  मेरे लिए भेजा है । यह थोड़ा - थोड़ा कर के सब बच्चों को खिला दो ।

 हुजूर सल्ल० ने दूध लेकर अक़ील के हलक में टपकाया । कुछ  देर बाद उस ने आंखें खोलीं । हुजूर सल्ल० ने प्याला उस के होंठों से लगा  दिया । उस ने बड़ी बे - सब्री से दूध पिया और कुछ ही घूट में तमाम प्याला  खाली कर दिया ।

अबू तालिब ने हज़रत ख़दीजा का खाना तमाम बच्चों में बांट दिया । 

अक़ील की हालत सुधर गयी । मां - बाप की जान में जान आयी । तमाम मुसलमान बहुत खुश हुए । अब हुजूर सल्ल० ने अबू तालिब से में कहा कि आज बाईकाट खत्म हो जाएगा । 

अबू तालिब उठ कर रवाना हुए ।

#दिलहिलादेनेवालाजुल्म

@alameainah



Wednesday, May 1, 2019

BAIKOAT

बाईकाट

हजरत उमर के मुसलमान होने से कुपफ़ारे मक्का में एक हंगामा मच  गया । हर आदमी ने हैरत और अफसोस के साथ यह खबर सुनो । मुसलमानों ने खाना काबा में नमाज पढ़ी , तो इसे बुतों की तौहीन समझा गया । 


तमाम मक्के में गम और गुस्से की एक लहर दौड़ गयी । 


 हज़रत उमर के इस्लाम ने मुसलमानों का हौसला इतना बढ़ा दिया  था कि वे आजादी के साथ चलने - फिरने लगे , खरीद व फरोख्त करने लगे , खाना काबा में नमाज़ अदा करने लगे । किसी को उन्हें रोकने और छेड़ने  की हिम्मत न होती । 



         इस आजादी की खबर हब्शा तक पहुंच गयी । जो मुसलमान वहां  हिजरत कर के पहुंच गये थे , वे समझे कि अब कुरैश ने मुखालफ़त बन्द  कर दी है और मुसलमानों को आजादी से रहना - सहना नसीब हो गया है ।  उन में से अक्सर अपने वतन लौट आए , पर जब यहां आकर मालूम हुआ  कि अभी कोई आजादी वगैरह नहीं मिली , कुफ्फ़ारे मक्का अपनी जिद से  बाज़ नहीं आए , तो फिर हबशा वापस चले गये । इसे हब्शा की दूसरी  हिजरत कहते हैं । 


उस वक्त मक्के में  सिर्फ चालीस लोग थे , जिन्होंने इस्लाम कुबूल किया था । इन के अलावा ८६ मुसलमान  वे थे , जो हिज़रत करके हब्शा चले गए थे ।  इस तरह मुसलमानों की कुल तायदाद १२३ होती थी । अगरचे । तायदाद मामूली थी , पर कुफ्फार को मुसलमानों की इस तायदाद से से भी डर  हो गया था  कि इसी तरह अगर ये बढ़ते रहे , तो तमाम मक्का सारा अरब मुसलमान हो जाएगा । इस ख्याल ने उन्हें बदला लेने की तदबीरों  पर गौर करने के लिए फिर मजबूर कर दिया । 



उन्होंने मुहर्रम सन् ०७ नबवी  में एक मज्लिसे शूरा बुलायी । तमाम   कबीलो के सरदारों को बुलाया गया । बड़ी शान व शौकत से इज्लास की तैयारी की गयी  । तमाम लोग बड़े जोश से शामिल हुए । 


 जब ये तमाम लोग आ गये , तो अबू सूफ़ियान की सदारत में इज्लास हैं शुरू हुआ । 


 अबू जहल  खड़ा हुआ और उस ने कहा , ऐ गैरतमंद अरबो ! तुम ने देखा कि जिस बात को हम ने बच्चों का खेल समझा था , वह बढ़ते - बढ़ते हैं । हमारे दीन के लिए मुस्तक़िल खतरा बन गयी है । लोग अपने बाप - दादा  के मजहब को छोड़कर के नये मजहब को अपनाने लगे हैं । मुहम्मद हमारे मजहब को मिटा कर नया मजहब रिवाज देने में दिन व रात लगे हुए हैं । वह कहते हैं , आक़ा - गुलाम सब बराबर हैं । पिछड़ों और ग़रीबों वगैरह  को उन्होंने सर पर चढ़ा लिया है । मेरे ख्याल में कोई अरब , जिस में ज़रा  भी खुद - दारी है , उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता । इस के अलावा सब से बड़ी  सब से अहम और सब से ज्यादा खतरनाक जो बात है , वह यह है कि हर हैं मुसलमान बुतों को हिकारत से देखता है गोया उन की नजरों में हमारे मज़हब की और हमारे माबूदों की कोई अहमियत नहीं है  बताइए , क्या हम इस जिल्लत को बर्दाश्त कर सकते हैं ?



 हर तरफ़ से आवाजें आयीं , हरगिज़ नहीं । 

अबू जहल ही ने बात और आगे बढ़ायी । 


 अगर नहीं बर्दाश्त कर सकते , तो फिर चुप क्यों बैठे हो ? क्या सोच  रहे हो ? किस चीज का इन्तिज़ार है ? तुम ने देख लिया कि बावजूद  हमारी कोशिशों के मुसलमानों की तायदाद दिन ब दिन बढ़ती चली जा  रही है । अगर कोई इन्तिजाम न किया गया , तो अंदेशा ही नहीं , बल्कि  यकीनी बात है कि तमाम मक्का , बल्कि तमाम अरब मुसलमान हो जाएंगे । आप  को मालूम है कि मुसलमानों की कितनी बड़ी तायदाद हब्शा को चली गयी है, क्या वे लोग चुपचाप बैठे होंगे? वहा जिस वक़त उन की तायदाद बढ़ जाएगी , यक़ीनन वे मक्के पर हमला करेंगे । कोई नहीं कह सकता  कि अंजाम वया होगा ? याद रखिए , अभी तो इस की शुरूआत है , को  करने से इस की रोक - थाम की जा सकती है , लेकिन अगर कोताही की  गयी , तो फिर इस बहाव पर बन्द नहीं बांधा जा सकेगा । अजब नहीं  अरब से हमारे माबूदों को , हमारे मजहब वालों को बड़ी बे आबरू से  निकलना पड़े , क्या तुम इसे पसन्द करोगे ?



 हम इसे हरगिज़ , हरगिज़ गवारा न कर सकेंगे सब ने एक साथ । अबु जहल ने कहा , मुझे भी यही ख्याल है कि तुम हरगिज़ गवार कर सकोगे , मगर इस खतरे को मिटाने के लिए क्या उपाय किया जाये ?



 कुछ आवाज आयीं , उपाय सोचना बड़े आदमियों का काम है । हमारा  काम सिर्फ इन पर अमल करना है । 



अबू जहल ने कहा , निहायत ही मुनासिब बात है । आज बडे लोग  इसीलिए जमा हुए है कि एक राय हो कर कोई ऐसा उपाय सोचे , जिससे  इस्लाम का खतरा मिट जाए , मुसलमानों की जड़ कट जाए और फिर  आराम की नींद सो सके । 



उत्बा ने कहा , खतरा मुहम्मद सल्ल० की तरफ़ से है । जब तक जिदा हैं , यह खतरा मिट नहीं सकता । मेरे ख्याल में तो कुछ लोग जाये  और उन्हें कत्ल कर के खतरे को मिटा डाले । 



 जुबैर बिन उमैया ने कहा , सब लोग अच्छी तरह से जानते है कि  मुहम्मद सल्ल ० हाशिमी खानदान से हैं । कुरैश में यह खानदान सब से  ज्यादा इज्जत वाला है । इसलिए उन्हें कत्ल करने से डर है कि खाना जगी  शुरू हो जाएगी । इस के अलावा यह कैसे मुम्किन है कि मुसलमान उन्हें है आसानी से मरने देंगे । वे जब तक खुद न मरेंगे , अपने नेता पर आंच न आने देंगे । इसलिए यह काम आसान नहीं है । 



उत्बा ने कहा , अगर तमाम लोग मिल जाएं , तो तज्वीज़ बताए देता है । सब लोगों ने कहा , हम सब मुत्तफ़िक़ हैं । आप बताएं । 



उत्वा ने बताया , मुसलमानों का वाईकाट करो । व्याह , शादी , लेन - देन  रस्म व रिवाज़ . मुलाक़ात , खाना - पीना , खरीद व फ़रोख्त वगैरह सब बंद  कर दो । उन्हें मजबूर करो कि ये बस्ती में न रहे , बल्कि पहाड़ पर चढ़  जाएं । यह निगरानी की जाये कि खाना - पीना और किसी क़िस्म का कोई १ सामान उन के पास न पहुंचे । इस तरह खुद तड़प - तड़प कर मर जाएग  और हमें किसी को मारने , उस के क़बीले को खून बहा अदा करने की  नौबत ही न आएगी ।




 इस तज्वीज को सुनकर सब खुश हो गये । खूब तालियां बजीं ।



 जब जरा खामोशी हुई तो जुबैर ने कहा , मेरे ख्याल में यह बहुत ही हैं जालिमाना काम है , इस से तो बेहतर यह होगा कि उन्हें कत्ल ही कर दिया  जाए ।  



अबू लहब ने कहा , जुबैर इस तज्वीज़ को मंजूर कर लो , इस से हमारा  मक्सद मुसलमानों को भूखा , प्यासा रख कर क़त्ल करना नहीं है , बल्कि  उन्हें मजबूर कर के इस्लाम से अपने मजहब में वापस लाना है ।



 जुबैर ने कहा अगर सिर्फ इस तरीके से तंग और परेशान करना मंजूर हैं , हैं तो मुझे कुछ उज्र नहीं  मैं शरीक हूं , लेकिन तुम इस तरह से उन्हें अगर  क़त्ल करना चाहो , तो मुझे शिर्कत मंजूर नहीं । 



 हम उन्हें क़त्ल करना तो चाहते ही नहीं , सिर्फ उन्हें दिक़ करना चाहते हैं  । अबू जहल ने कहा , बहुत जल्द वह परेशान होकर हमारे माबूदों के  सामने आ झुकेंगे और फिर क़ौम को कोई खतरा बाक़ी नहीं रहेगा ।  



अबू सुफ़ियान ने कहा , यह मुनासिब है कि एक अहद नामा  तैयार किया है हैं जाए और अहद  नामा का मजमून यह हो कि मुसलमानों से उस वक्त तक  बाईकाट किया जाए , जब तक वह इस्लाम से हटकर अपने बाप - दादा के हैं मजहब में फिर दाखिल न हों और इस अहद  नामों पर तमाम लोग दस्तखत करें ।  



उत्बा ने ताईद करते हुए कहा , बिल्कुल सही है और निहायत मुनासिब है । 



चूंकि सब इस राय से मुत्तफ़िक़ हो गये , इस लिए मंसूर बिन इक्रिमा हैं ने अह्द नामा लिखा । सब ने दस्तखत किये और इस अद नामा को काबे  के दरवाजे पर लटका दिया । उस जमाने में यह तरीक़ा था कि जब समझौता लिखा जाता तो काबे के दरवाजे पर लटका दिया जाता था और जब तक वह तहरीर बाक़ी रहती , कोई अह्द के तोड़ने की जुरात न  करता था । 



 चुनांचे अह्दनामा लटका दिया गया , तो आस बिन वाइल सहमी ने  कहा , आज ही मुसलमानों को ले जा कर पहाड़ी के किसी दरें में घेर दो ।  सब ने इस राय को पसन्द किया , चंकि उस वक्त तमाम असरदार लोग मौजूद थे , इस से अच्छा मौक़ा और कब मिल सकता था ? सब उठे और  सीधे दारे अरक़म में जा पहुंचे । यहां मुसलमान जमा थे । वे अस्र की नमाज़ से फारिग  हुए थे कि अबू जहल ने उन्हें क़ौम के मुत्तफ़िक़ा फैसले से  खबरदार करते हुए कहा- 



 अगर तुम लोग मुहम्मद सल्ल० का साथ छोड़ दो तो तुम को आज़ादी दी  जा सकती है । तमाम मुसलमानों ने एक जुबान होकर कहा , मर जाएंगे , मगर खुदा  के प्यारे नबी सल्ल० का साथ न छोड़ेंगे । 


अबू जहल  झुल्ला  कर बोला , न छोडो , खुद ही दरें में तड़प कर मर  जाओगे । 

अबू जहल  ने कहा , तुम पर इतनी मेहरबानी की जाती है कि जो सामान इस वक्त तुम्हारे पास है , अपने साथ ले जा सकते हो , मगर इस के बाद फिर कोई सामान न मिल सकेगा । 

मुसलमान दारे अरकम से निकले , कि उस वक्त तक हुज़ूर  सल्ल. ने  कुपफ़ार से मुलाकात करने या लड़ने की इजाजत न दी थी , इसलिए खामोश अपने - अपने घरों को जाते रहे । 

 जितना सामान था , अपने साथ लिया और शोथे अबी तालिब  में चले गये । 

 शोबे अबी तालिब एक पहाड़ी दर्रा था । यह दर्रा अबू तालिब के नाम  से मशहूर था । चूकि हुजूर सल्ल० के सरपरस्त अबू  तालिब  थे , इसलिए वह मुसलमानों के साथ जाने पर मजबूर कर दिये गये । 

तमाम मुसलमान शोबे अबू  तालिब में जाकर पनाह लेने वाले बन गए | अबु जहल ने कुछ लोगों को उन की निगरानी पर मुकर्रर  कर के हिदायत कर दी कि कोई मुरालभान इस दरे से बाहर निकलने न पाये , न किसी  आदमी को उन के पास जाने दिया जाए । इस तरह मुसलमान दरे में कैद कर दिए गए ।

Tuesday, April 16, 2019

Hazarat Omar became a Muslim

हज़रत उमर मुसलमान हो गए

हजरत उमर कुरैश की नस्ल से थे , जो आठवीं पीढ़ी में हुजूर सल्ल.  से मिल जाता है । बड़े बहादुर और जोशीले थे । वह नवजवान थे , उन की  उम्र २७ वर्ष की थी । गुस्सा भी उन्हें था । तमाम अरब में वह ' अरब के  शेर के नाम से मशहूर थे । आप अच्छी तरह से लिखना - पढ़ना नहीं जानते  थे । अरबी जुबान के माहिर थे । आप बहादुर भी थे और निडर भो । जब  और जिस से उलझ जाते थे , वही दब जाए , तो जाए पर आप न दबते थे ।

तमाम अरब जानता था कि उमर जब मयान  से तलवार निकाल लेते हैं , तो वह अपना काम कर के ही वापस म्यान में आती है । आपने तलवार  म्यान से निकाल कर हुजूर सल्ल० को कत्ल करने का इरादा किया था ।  इसलिए सब समझ रहे थे कि उमर की तलवार मुहम्मद ( सल्ल० ) का ? काम तमाम कर के ही म्यान में वापस जाएगी ।

 इस ख्याल से लोगों को बड़ी खुशी हुई । कुछ ही लम्हे में मक्का में यह खबर बिजली  की तरह फैल गयी कि उमर हुजूर सल्ल० को क़तल करने के  लिए चल चुके हैं ।

उमर बड़ी शान से झूमते - झामते हाथ में नंगी तलवार लिए चले जा रहे थे  । जब वह बाजार के आखिरी सिरे पर पहुंचे , तो उन के सामने से व साद बिन अबी वफ़ास आते हुए मिले । हजरत साद मुसलमान हो चुके थे उमर के हाथ में नगी तलवार देख कर वह ठिठके । उमर को रोकते हुए कहा , हाथ में नंगी तलवार कहां लिए जा रहे हैं?

मुहम्मद को क़त्ल करने । उस ने क़ौम में बड़ा फितना  पैदा कर दिया है । आज उस का खात्मा कर के आऊंगा । उमर ने कहा ।

हजरत साद यह सुन कर बड़े परेशान हुए , बोले , हुजूर सल्ल० को क़तल  कर के तुझे क्या मिलेगा ?

 उमर ने गुस्से में कहा , क्या तू भी मुसलमान हो गया है ?

हां , मैं भी मुसलमान हो गया हूँ । साद ने कहा ।

फिर आगे फ़रमाया , पहले अपने घर की खबर लो , तो  हुजूर सल्ल०  को बाद में कत्ल करना ।

उमर  ने पूछा , घर की क्या खबर लु ?

 तुम्हारी बहन फातमा और तुम्हारे बहनोई सईद बिन जैद भी मुसलमान हो चुके हैं ।

यह सुन कर उमर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया ।

 उन्हों ने जोश भरी आवाज़ में कहा , अगर यह बात है , तो पहले इन दोनों का खात्मा कर आऊं ।

इतना कह कर वह अपने बहनोई के मकान की तरफ़ पलटे ।

 हज़रत साद भी यही चाहते थे कि किसी न किसी तरह उन्हें इतना हैं मौका मिल जाये कि वह हुजूर सल्ल० को इस की इत्तिला करा दें । उमर  के पलटते ही वह पलटे और जल्दी से कदम उठा कर वह , अरक़म के  मकान की तरफ चल पड़े । उस वक्त हुजूर सल्ल० नहीं थे ।

 उमर जोश में भरे हुए हज़रत सईद के मकान पर पहुंचे । दरवाजा  बन्द था और किसी के पढ़ने की आवाज़ आ रही थी । आप दरवाजे से लग  कर खड़े हो गये और कान लगाकर सुनने लगे । धीमी आवाज़ की वजह से पूरा न सुन सके , लेकिन इतना अन्दाज़ा हो गया कि शायद कोई कुरआन मज़ीद  पढ़ रहा है ।

 उमर का गुस्सा बढ़ गया , दरवाजा शोर से खटखटाया । दरवाजा खुला और आपकी बहन फातमा दरवाजे पर खड़ी नज़र आयीं ।

भाई जान ! आप हैं ? आ जाइए । हजरत फातमा ने कहा ।

 उमर गुस्से में भरे हुए मकान के अन्दर दाखिल हुए । सामने ही  चटाई पर आप के बहनोई हजरत सईद बैठे थे । वह उमर का भरा चेहरा देखकर सहम गए । डरते - डरते अदब के तौर पर खड़े हो गए । उमर ने बढ़कर तलवार चटाई पर रख दी और हजरत सईद से पूछा बताओ  तुम क्या पढ़ रहे थे ?

उमर  इस तरह खड़े थे , गोया हजरत सईद पर झपटने वाले हैं ।

उन की बहन फ़ातमा यह देख कर समझ गयीं कि उमर को उन के  मुसलमान होने का इल्म हो चुका है । चूंकि उमर बड़े जोशीले हैं , जरूर   सईद रजि० को मारे - पीटेंगे , साथ ही उन को यह भी मालूम था कि हज़रत  लुबनिया , उन की बांदी मुसलमान हो गयी  और वह उन्हें इस कदर मारते हैं कि मारते - मारते थक जाते हैं , इस लिए वह डर गयीं और उन्होंने  फ़रमाया

      भाई जान ! तश्रीफ़ रखिये । हम जो पढ़ रहे थे , आप को सुना देंगे । उमर गुस्से में भरे हुए थे । उन्हों ने हज़रत फातमा को झटका देकर  अलग कर दिया और हजरत सईद का दामन पकड़ कर उन्हें झटक देते हुए कहा , ओ गुमराह ! तु क्या पढ़ रहा था ?


 हजरत सईद डरी हुई निगाहों से उन्हें देखने लगे । कुछ जवाब न  दिया ।

उमर को इतना गुस्सा आया कि उन्हों ने हज़रत सईद को नीचे गिरा  दिया । मारना शुरू किया , मारते जाते थे और कहते जाते थे कि कमबख्त !  तुम मुसलमान हो गये हो । अब मुसलमान होने का मज़ा चखो ।


 हज़रत सईद रजि० ने कोई जवाब न दिया । खामोश पड़े पिटते रहे । उमर ने कहा , जलील , कमीने , तुम ने इस्लाम कुबूल कर के हमारे  खानदान को बट्टा लगा दिया है । बोल , क्या तू इस्लाम छोड़ेगा ?

 हज़रत सईद ने कहा , नहीं , नहीं , मरते दम तक इस्लाम का दामन हाथ  से न छोडूंगा ।

 यह जवाब सुन कर उमर पहले से भी ज्यादा ग़ज़बनाक  हो कर  बिफरे , आपे से बाहर हो गये । उन्हों ने और ज्यादा मारना शुरू कर  दिया ।

 अब हज़रत फातमा से सब्र न हो सका ।

उन्हों ने उमर का हाथ पकड़ते हुए कहा , भाईजान ! बस करो ।

आखिर कब तक मारोगे ?

 उमर तो गुस्से में भरे ही थे । आप ने जोर से एक घुसा मारा । फ़ातमा  सर दीवार से टकरा गया , फटा और खून बह कर चेहरे पर फैलने  लगा ।

हजरत फातमा रजि० ने जोश में भर कर कहा , हां ऐ उमर ! हम  मुस्लमान  हो चुके हैं , मुहम्मद सल्ल० के फ़रमांबरदार बन गये हैं , जो तुम  से हो सके , करो ।

 उमर ने फ़ातमा का खून में सना चेहरा देखा , तो आप का गुस्सा धीमा हैं पड़ गया । आप ने हजरत सईद रजि० को छोड़ दिया । उठे और बहन से  बोले , मुझे वह कलाम लाकर दिखाओ या सुनायो , जो तुम अभी - अभी पढ़ रहे थे ।

 उमर ने यह बात संजीदगी से कही थी , हज़रत फ़ातमा ने चेहरे से ही हैं भांप लिया था , इसलिए उन्हों ने थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए कहा -

 ऐ भाई । हम कुरआन पढ़ रहे थे । कुरआन के बारे में अल्लाह ने है फ़रमाया है कि इस को वही छू सकते हैं , जो पाक हैं । अगर आप नहा कर  आए हैं , तो हम आप को पढ़ कर सुना सकते हैं , इस में शक नहीं कि यह  खुदा का हुक्म है ।

 इस कहने का मक्सद यह था कि उमर नहा लें , ताकि उन्हें जो थोड़ा हैं बहुत गुस्सा रह गया है , वह भी जाता रहे ।

 उमर को कुरआन मजीद सुनने का बहुत शौक़ था । उन्हों ने कहा , अच्छा , मैं गुस्ल कर के आता हूँ ।

 यह कहते ही वह बाहर चले गये ।

 एक अरब मकान के अन्दर छिपे हुए थे । यह खब्बाब बिन अरत्त थे । क़ुरआन मजीद की तालीम देने के लिए हज़रत सईद रजि० के पास आते,  उमर को देख कर छिप गये थे । उन्हों ने हजरत फातमा को खिताब कर के कहा , फ़ातमा ! तुमने यह क्या ग़ज़ब किया कि अपने भाई को क़रआनी आयतों के दिखाने का वायदा कर लिया ।

 हजरत फ़ातमा ने कहा , इत्मीनान रखो खब्बाब ! मुझे यकीन है कि  कलामे इलाही उमर के दिल पर असर किये बगैर न रहेगा ।

खब्बाब ने कहा , खुदा ऐसा की करे ।

अब हजरत सईद रजि० भी उठ कर खड़े हो गये थे ।  उन्हों ने कहा मेरा दिल गवाही देता है कि उमर मुसलमान हो  जाएंगे ।

हज़रत खम्बाब रजि० ने कहा , खुदा करे , ऐसा ही हो । उमर के मुसलमान होने से इस्लाम और मुसलमानों को बड़ी ताक़त मिलेगी ।

हजरत फातमा  रजि० के जख्म से खून अब तक जारी था ।

 हजरत सईद ने कहा , तुम अपना सर और मुह धो डालो ।

 फातमा ने मुह - हाथ धोया , जख्म पर पट्टी बांधी ।

इस बीच उमर नहा - धो कर आ गये ।

 उन्हों ने आते ही कहा , अब दिखाओ , तुम क्या पढ़ रहे थे ?

  उमर को आते हुए देख कर खब्बाब फिर घर के अन्दर जा छिपे ।

हजरत फातमा अन्दर से कुछ पन्ने लायौं । इन पर सूरः हदीद  लिखी  हुई थी ।

उमर ने हज़रत फातमा से वे पन्ने लेकर खुद ही पढ़ना शुरू कर दिया था-

"जमीन व आसमान के रहने वाले खुदा की तस्बीह करते हैं और खदा 8 ही ग़ालिब और हिक्मत वाला है । वह आसमानों और जमीन का बादशाह है । वही जिदा करता है , मारता है और हर चीज पर कुदरत रखता है ।

 उमर ने अभी इतना ही पढ़ा था कि बोल उठे , वाह ! क्या मीठा कलाम है । ऐसा कलाम आज तक न मैं ने देखा , न सुना । इस का असर सीधे दिल पर होता है ।

आप ने पढ़ना शुरू किया । ज्यों - ज्यों आप पढ़ते जाते थे , दिल मुतास्सिर  होता चला गया । जब आप ने यह आयत पढ़ी - - ‘ खुदा और उस के रसूल  पर ईमान ले आओ और खर्च करो उस चीज को , जिसे तुम्हें पहले लोगों  का जानशीन कर के दिया गया है । पस जो लोग ईमान लाये , उनके लिए  बड़ा सवाब है ।

 इन आयतों ना उमर पर बड़ा असर पड़ा और वह बे - अख्तियार  पुकार उठे , यह कलाम वहुत उम्दा है । मैं ईमान लाया इस पर ।

उमर को इस तब्दीली से हजरत सईद , फ़ातमा दोनों बहुत खुश हुए ।  हज़रत खव्वाब भी खुश हो कर बाहर निकल आए । उन्हों ने आते ही उन  को सलाम किया ।

हज़रत खब्बाब  ने कहा , मैं आप के बहनोई और बहन को कुरआन  मजीद की तालीम देने आया करता था । आप  को देख कर छिप गया था ।  ऐ ख़त्ताव के बेटे ! मुबारक हो । मुहम्मद सल्ल० की दुआ आप के हक़ में हैं मक्बूल हुई ।

 कैसी दुआ ! हज़रत उमर ने पूछा ।

हुज़ूर  सल्ल० ने कल दुआ फरमायी थी , इलाही ।   उमर को मुस्लमान कर दे या अबू जहल को ।  मालूम होता है । तुम्हारे हक में  दुआ मकबूल हो गयी ।

 हजरत उमर ने फ़रमाया , अब मुझे हुज़ूर  के पास ले चलो । मैं वही  चल कर मुसलमान हूंगा ।

चुनांचे हजरत सईद , हजरत फातमा , हजरत ख्वाब रजि० उन्हें साथ  ले कर रवाना हुए । हजरत उमर ने तलवार हाथ में ले ली । उधर हजरत साद बिन अबी वक्कास आप की खिदमत में हाजिर होकर हजरत उमर के  आने की कैफ़ियत बयान कर चुके थे । कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई । लोगों ने दरवाजे से झांक  कर देखा , हजरत उमर नंगी तलवार लिए  खड़े नजर आए ।

 सहाबा रजि० ने हुजूर सल्ल० से जिक्र किया हुजुर सल्ल० ने हम है दिया कि दरवाजा खोल दो ।

 हज़रत अमीर हमजा भी मौजूद थे । उन्हों ने भी फरमाया , बेशक  दरवाजा खोल दो । अगर उमर नेक इरादे से आया है , तो खैर , वरना इसी  तलवार से उस का सर उड़ा दिया जाएगा ।

 चुनांचे सहाबा किराम ने क़रीब जा कर दरवाजा खोला । हजरत  उमर मकान के अन्दर दाखिल हुए । जब वह हज़र सल्ल० के करीब पहुंचे तो आप उठ खड़े हुए । आप के साथ तमाम सहाबी भी उठ खड़े हुए ।

 जलाल भरी आवाज़ में हुजूर सल्ल० ने पूछा , उमर । किस इरादे से  आए हो ?

 इस रोवदार आवाज ने हजरत उमर को कपकपा दिया ।

  उन्होंने कहा , ऐ खुदा के मोहतरम रसूल ! मैं मुसलमान होने आया हूं ।

हुजूर सल्ल० ने खुशी में पूरी आवाज से अल्लाह अकबर का नारा बुलन्द किया । दारे अरक़म और मुहल्ले की तमाम पहाड़िया गुंज  उठीं । 

 हुजूर सल्ल० उसी जगह बैठ गये । तमाम सहाबा  रजि० आप  के चारों हए । ६ ओर बैठ गये और हजरत उमर सामने बैठ गये । हुजूर सल्ल०  ने कलिमा  पढ़ा कर हज़रत उमर को मुसलमान किया ।

 हज़रत उमर ने इस्लाम कुबूल करने के बाद कहा , ऐ खुदा के हबीब !

मैं चाहता हूं कि आज खाना काबा में चल कर नमाज अदा कीजिए ।

हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया , अगर तुम्हारा यही इरादा है , तो चलो ।

सब उठ खड़े हुए । दारे अरक़म से बाहर आए और खाना काबा की  तरफ रवाना हुए ।



हज़रत उमर सब से आगे नंगी तलवार लिए चल रहे थे । हुजूर सल्ल० के सीधे हाथ पर हजरत अबू बक्र और उलटे हाथ पर हमज़ा और उन के बराबर हजरत अली चल रहे थे । बाक़ी सहाबा के पीछे थे  ।

 कुफ्फ़ारे मक्का ने जब इस शान से मुसलमानों को आते देखा , तो उन  को बड़ी हैरत हुई । रास्ते में अबू जहल  मिला , उसे देखते ही हजर  उमर रज़ि० ने कहा-

 अबू जहल  ! खुदा का शुक्र है कि मैं मुसलमान हो गया हूं । मुहम्मद  सल्ल० को खुदा का रसूल मानता हूँ । 

अबू जहल  को कुछ कहने का हौसला न हुआ और मुसलमानों ने खान  काबा में नमाज़ पढ़ी , कुफ्फ़ारे मक्का एक ओर खड़े रहे ।  यह पहली नमाज थी , जो मुसलमानों ने एलानिया खाना काबा में  पढ़ी । नमाज़ पढ़ कर लोग वापस आ गये । हज़रत उमर की वजह से  किसी काफ़िर को कुछ कहने की हिम्मत न हुई ।

यह वाक़िआ जिलहिज्जा सन ०६ नबवी का है ।

Friday, April 12, 2019

QATAL KA MASHWARA

हजरत अमीर हमजा जैसे निडर और बहादुर शख्स के इस्लाम अपना  लेने की खबर जंगल की आग की तरह मक्के के एक - एक घर में पहुंच गई । कुण्फ़ारे मक्का के लिए यह बड़ा धमाका था । वे बहुत तिलमिलाये ,लेकिन हिम्मत न हुई कि हजरत हमजा को कुछ कह सकें या उन्हें सता सकें ।   उन के खिलाफ़ राजदारी से खुफ़िया मश्विरा करने लगे ।

 हजरत अमीर हमज़ा के मुसलमान होने से आवारा लड़कों और गुंडों और बदमाशों के हौसले भी पस्त हो गये । सब ने यही समझ लिया कि अब  अगर मुसलमानों को सताया गया , तो अमीर हमजा बदला लिए बिना न  रहेंगे । इस लिए वे भी एहयियात करने लगे , लेकिन जब और जिस वक्त  मौक़ा पाते , सताये बिना न रहते थे ।

 अब फिर मुसलमान कुछ आजादी से बाजारों में आने - जाने लगे और  खाने - पीने की फ़राखी हो गयी । लोगों से मिलने - जुलने लगे और तब्लीग  का सिलसिला तेज हो गया ।

 हर मुसलमान जिस से भी मिलता , इस्लामी तालीम उस के सामने पेश करता , कुरआन मजीद की आयतें सुनाता , लोगों पर उन का असर होता ।  कुछ मुसलमान हो जाते और अक्सर को मुसलमानों से हमदर्दी हो जाती  इस तरह से इस्लाम धीरे - धीरे फैलने लगा ।

कुण्फ़ारे  मक्का को इस से बड़ी चिन्ता हो गयी ।

 उन्हों ने एक मज्लिसे शूरा बुलायी । फ़ौरन ही तमाम लोग जमा हो गये । इज्लास शुरू हुआ । इस बार अब सुफ़ियान को सदर बनाया गया ।


   अबू जहल ने कहा , अरब भाइयो ! कितने अफ़सोस की बात है कि जितना मुसलमानों को दबाने की कोशिश की गयी , उतना ही वे उभरते  चले गये । जो लोग हिजरत कर के हब्शा चले गये हैं , उन की ओर से डर  है कि वे कहीं हब्शा के बादशाह को मक्के पर न चढ़ा लायें । मुसलमानो का हाल यह है की  उन पर मुहम्मद का जो जादू एक बार चढ़ गया , तो  अब उतरने का नाम नहीं लेता । न जाने मुहम्मद में कौन सा जादू है कि सब उस पर मोहित हो जाते हैं । मैं ने काहिनों से पूछा , आराफ़ से पूछा ,  तो वे भी इस के अलावा कुछ नहीं बताते । अबरश के पास में गया था , उस  ने मुझे बताया कि अगर हम ने जल्दी न की और फ़ित्ने को दबा न  दिया , तो सारा मक्का , बल्कि तमाम अरब , बल्कि दुनिया का बड़ा हिस्सा  मुसलमान  हो जाएगा । कितने जिल्लत और रुसवाई की बात है यह हमारे  लिए  ।

अबू जहल  ने पूरे मज्मे पर निगाह डाली । हर तरफ़ से आवाजें आयों नहीं  , हम ऐसा नहीं होने देंगे । हम इस जिल्लत को बर्दाश्त करने के लिए है  जिंदा  नहीं रहना चाहते ।

 अबू जहल ने जोश में आ कर कहा , इस तरह से न कहो , बल्कि  हम अपनी जिंदगी यह कहो कि  हम अपनी जिंदगी में ऐसा वक्त न आने देंगे ।

 फिर आवाज़ आयी , बेशक हम ऐसा वक्त न आने देंगे ।

  अबू जहल ने कहा , जब यह बात है , तो तै कर लीजिए कि इस्लाम का  खतरा  किस तरह मिटाए , क्या उपाय करें , जिस से इस्लाम न फैलने पाये ।

 अबू जहल बोला , लगता है कि हम इस बात से डर गये हैं कि अमीरे हमजा  मुसलमान हो गये , और हम ने सख्तियो  में कमी कर दी , मुसलमानों  की हिम्मत बढ़ गयो । हमें चाहिए कि हम फिर पहले ही की तरह सख्तियो  शुरू कर दें कि कोई मुसलमान घर से बाहर न निकलने पाये , न वे बाहर  जायेंगे , न इलाम फैलेगा  ।

 वलीद  ने कहा , इस सिलसिले में न हम को पहले कामियाबी हुई और न अब उम्मीद है । बेहतर है कि मुसलमानों का क़त्ले आम कर के उन का ई खात्मा ही कर दिया जाए ।

उतबा  बोला  , हमारा ऐसा करना , तमाम कबीलों से लड़ाई की दावत  देना है , क्योंकि जो लोग मुसलमान हुए हैं , वे हर कबीले से ताल्लुक रखते ई है । यह नामुनासिब तजवीज़  है ।

अबू जहल  बोला , मैं भी इसे पसन्द नहीं करता । बेचारे आम मुसलमानों का क्या कुसूर है ? उस पर तो जादु कर दिया गया है , क्यों न उस आदमी को क़त्ल कर डालो , जो सब से बड़ा जादूगर है और पूरे फ़ितनो का जड़ है ।

उमर ने कहा , यही बेहतर राय मालूम होती है ।

 आस  बिन  वाइल सहमी बोला , इस बात को सोच लो कि मुहम्मद  हाशिमी हैं । अगर इन के क़त्ल से बनू हाशिम खानदान उठ खड़ा हुआ , तो गया  तो  फिर वही शक्ल होगी कि तमाम अरब  कबीलो  में लड़ाई शुरू हो जाएगी ।

अबू लहब  ने कहा , तुम इस से मुतमइन रहो । मैं भी हाशिमी  हु,  मैं  अपने कबीले को काबू  में रखेगा ।

वलीद ने संभल कर कहा , अगर यह बात है , तो अब कोई खतरा नहीं है । बस , अब मुहम्मद का खात्मा ही कर डालो ।

अबू जहल  ने तमाम लोगों को ख़िताब करते हुए कहा , बोलो   , कौन   अपने माबूदों  , अपने मजहब , अपनी कोम की हिमायत ने काम करने को तैयार है ।

अबू जहल की इस ललकार पर लोग खामोश हो गये ।

 उमर को जोश आ गया और उन्होंने जोशीले अन्दाज़ में कहा , म फित्ने का खात्मा कर दूंगा  । मेरी तलवार बगैर महम्मद ( सल्ल० ) को  खत्म किये म्यान में न जाएगी ।

मज्मा उछल पड़ा । उमर की बहादुरी की तारीफ़ होने लगी ।

अबू जहल ने हिम्मत बढ़ाते हुए कहा , ऐ ख़त्ताब के बेटे उमर !  मुहम्मद को जब क़त्ल कर के आओगे , तो मैं तुम को सौ सुर्ख ऊट इनाम  में दूंगा ।

 उमर बोले , मैं किसी लालच में नहीं , बल्कि क़ौम की भलाई में यह  काम करूगा ।

अबू जहल  तुरन्त बोला , यह तो सभी जानते हैं , मैं तो सिर्फ इनाम की  बात कर रहा हूं ।

उमर ने कहा , तो खुशी से तुम्हारा इनाम कुबल करूगा ।

 इस के बाद उमर उठे और हुज़ूर सल्ल० के मकान की तरफ़ चल दिए

तमाम मज्मा उन की कामियाब वापसी का इन्तिजार करने लगा ।

Tuesday, April 9, 2019

HAZRAT AMEER HAMAZA ISLAM KI GOD MEIN


हजरत अमीर हमजा इस्लाम की गोद में (Hazrat Amir Hamza in the lap of Islam)




यह  वफद  जहा पहुंच कर मक्का की तरफ़ रवाना हुआ ।
 मक्का वालों को पूरा यक़ीन था कि हब्शा का बादशाह नजाशी मुसलमानो  को वफ्द के हवाले कर देगा । उन्होंने तै कर लिया था कि अब  तमाम मुसलमानों को कैद कर देंगे , ताकि वे बाहर न जा सके , न किसी  से मिल सकें । चाहते तो यह थे कि तमाम मुसलमानों को क़त्ल कर डालें , लेकिन मुसलमान किसी एक क़बीले से ताल्लुक़ न रखते थे , इस लिए उन्हें  यह अंदेशा था कि अगर एक क़बीला भी किसी एक मुसलमान के खून का  बदला लेने के लिए उठ खड़ा हुआ , तो फिर तमाम क़बीलों में लड़ाई छिड़ जाएगी और चूंकि आए दिन की लड़ाइयों ने उन का तमाम कस - बल   निकाल दिया था , इसलिए वे किसी एक लड़ाई के लिए भी तैयार न थे ,  जिस से कि तमाम अरब में आग लग जाए और अरब का अम्न व अमान है खाक में मिल जाए ।

 इस डर से , वे मुसलमानों को क़त्ल करने में हील - हुज्जत कर रहे थे । उन्हों ने यह तै कर लिया था कि जितने मुसलमान हैं , उन सब को एक हैं जगह जमा कर के कैद कर दें और बहुत कड़ाई से उन की निगरानी की  जाए ।

यह ख्याली पुलाव पका ही रहे थे कि वफद  आ गया और उस ने अपनी   नाकामी की पूरी दास्तान कुरैश को कह सुनायी । वफ्द के नाकाम आने से । मक्का के तमाम काफ़िरों को बड़ा रंज हुआ । हब्शा के बादशाह नजाशी पर भी गुस्सा आया , पर उनमें इतनी ताक़त नहीं थी कि हब्शा के बादशाह पर चढ़ाई कर देते और उस से तलवार के बल पर अपनी मांग मंजूर करा सकते । इस लिए ख़ामोशी को ही बेहतर समझा । उन्हें यह डर हुआ कि ? शायद हब्शा के मुसलमान मसीही बादशाह नजाशी को मक्के पर न चढ़ा  लायें । इसलिए उन्हों ने खुफ़िया तरीके से लड़ाई की तैयारियां शुरू कर  दीं और जद्दा में सुराग़रसां भेज दिये , ताकि जब वे ईसाई फ़ौज को आता  देखें , तो मक्के वालों को खबर कर दें ।

इस इन्तिजाम के बाद उन्हों ने उन मुसलमानों पर जो मक्के में रह गये  थे और रसूल सल्ल० की मुहब्बत की वजह से हिजरत न कर सकते थे ,  इतनी सख्तियां शुरू कर दीं कि उन्हें जिंदगी से मौत कहीं अच्छी नजर  आने लगी । मक्का के काफ़िरों ने यह कोशिश की कि मुसलमानों को खाने - पीने का सामान न मिल सके , इसलिए दुकानदारों को हिदायत कर दी  कि कोई चीज किसी मुसलमान के हाथ किसी क़ीमत पर हरगिज़ न बेचें  और बाक़ी पर भी पहरा बिठाया गया । इस से मुसलमानों को बेहद  तक्लीफ़ का सामना करना पड़ा । कई - कई दिन तक खाना न मिलता था  और प्यास बुझाने को पानी भी हाथ न आता था , इसलिए वे घरों में भूखे और प्यासे छिपे बैठे रहते । बाहर निकलते तो आवारा और बदमाश हैं लड़के उन के पोछे लग जाते , उन्हें मारते , गालियां देते , यहां तक कि कपड़े फाड़ डालते । मुसलमान बड़ी तक्लीफ़ और परेशानी में थे ।

 मगर वे ऐसे अक़ीदे के पक्के थे कि सख्तियां बर्दाश्त कर रहे थे । मुसीबतों पर मुसीबतें झेल रहे थे , लेकिन कदम न डगमगाते थे । कुफ्फ़ारे हैं मक्का इस से और हैरान व परेशान रहते थे ।

 एक दिन हुजूर सल्ल० लोगों की नजरों से छिप कर सफ़ा पहाड़ पर  जा पहुंचे ।

अस्र का वक्त हो गया था । आप एक घाटी में नमाज पढ़ने लगे ।  इत्तिफ़ाक़ से अबु जहल  उधर आ निकला । आप को नमाज़ पढ़ते देख कर  खड़ा हो गया और गैज़ व गजव भरी नज़रों से हुजूर सल्ल० की तरफ़  देखने लगा ।

जब आप सल्ल० नमाज़ से फ़ारिग हुए तो अबू जहल  बढ़कर आप के पास पहुंचा और गुस्ताखी के साथ बोला , मुहम्मद ! तेरी जात  ने तमाम  क़ौम और सारे अरब को बड़े फ़ित्ने में डाल रखा है । क्यों न आज मैं तेरा खात्मा कर डालूं ? ।

आप खामोश रहे ।

इत्तिफ़ाक़ से अबू जहल  की एक लौंडी भी उधर से आ निकली । वह एक चट्टान के पीछे छिप कर देखने लगी कि अबू जहल  मुहम्मद के साथ  क्या सुलूक करता है ?

जब  हुज़र सल्ल० ने अबू जहल को कुछ जवाब न दिया , तो उस ने   फिर कहा , मुहम्मद , तुम ने क़ौम को बेहद मुश्किलों में डाल रखा है ।

 आप ने फ़रमाया , अबू जहल ! मैं ने क़ौम को मुश्किलों में फंसा दिया  है या कोम ने मुझे और मुसलमानों को मुसीबत में डाल रखा है ?  अबू जहल  बोला , अगर तु इस्लाम की तब्लीग़ छोड़ दे , तो हम तुझे  मक्के का वादशाह बना दें ।

 मैं बादशाही नहीं चाहता । आप ने फ़रमाया ।
 जितनी दौलत कहो , तुम्हें दे दें । अबू जहल  ने कहा

 खुदा  की कसम ! मुझे दौलत की परवाह नहीं है । आप ने फ़रमाया ।

  खुदा के नाम से काफिरों को चिढ़ थी । अबू जहल भी खुदा का नाम  सुनकर फुकारें मारने लगा । खूब जी भरकर आपकी शान में गुस्ताखी की, बुरा - भला कहने लगा ।

हुजूर सन० खामोश बैठे रहे ।

 अबू जहल  का गुस्सा बढ़ता गया । गुस्से में आ कर एक पत्थर उठाया  और अपनी पूरी ताक़त से खींच मारा । पत्थर आप की पेशानी पर पड़ा ।  खून का फ़व्वारा उबल पड़ा और आप लहूलुहान हो गये । आप हाथ से  खून पोंछते जाते थे और कहते जाते थे कि अबू जहल  ! तुम मुझको जितना  भी सता सकते हो , सता लो । मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं ।

अबू जहल  डर गया कि आप कहीं शहीद न हो जाएं , जिसकी वजह  में बनी हाशिम खानदान उस से , उस के खानदान से , साथ ही उस के  क़बीले से हुजूर सल्ल० का बदला ले ले । इसलिए वह इधर - उधर देखते से हुए वहां से चल पड़ा उस के चले जाने के बाद हुजूर सल्ल० भी उठे और है अपने मकान की ओर चल पड़े ।

अबू जहल  की बांदी ने इस पूरे वाक़िए को अपनी आंखों से देखा । उसे अबू जहल  पर बड़ा गुस्सा आया ।

उस वक्त सूरज डूब गया था , अंधेरा फैल रहा था । बांदी भी खाना  काबा की तरफ़ चल पड़ी । वहां उसे अमीर हमजा मिल गये । अमीर  हमज़ा हुजूर सल्ल० के चचा और दूध शरीक भाई भी थे । वह वही शिकार  का शौक़ पूरा कर के खाना काबा का तवाफ़ करने आये थे ।

 बांदी ने अमीर से कहा , ऐ अमीर ! ठहर जाओ , मुझे आप से कुछ है कहना है ।  हजरत हमजा खड़े हो गये , बोले , क्या कहना चाहती हो ?

 उस ने कहा , क्या मुहम्मद सल्ल० तुम्हारे भतीजे और दूध शरीक भाई  नहीं हैं ?

 क्यों नहीं ? हज़रत हमजा बोले ।

क्यों  आप को उन से मुहब्बत नहीं है ? बांदी ने पूछा ।

 मुझे उन से बहुत ज्यादा मुहब्बत है ।

अफ़सोस है , ऐ अमीर ! बांदी ने कहा , तुम्हारे भतीजे पर लोग बेजा  तख्तियां करते हैं और तुम को परवाह तक नहीं होती । अभी मुहम्मद सल्ल० सफ़ा की पहाड़ी पर बैठे थे । अब जहल ने उन को सैकड़ों गालिया दीं । जब हुजूर सल्ल० ने जवाब न दिया , तो उस ने एक बड़ा पत्थर उठा  कर उन के सर पर दे मारा । उन का सर फट गया और खून का फ़व्वारा  बह निकला ।

बांदी की इस बात से अमीर हमज़ा को जोश आ गया । बोले , मैं अभी  उस कमबख्त से जा कर बदला लेता हू ।


यह कह कर वह आगे बढ़ गये ।

अबू जहल  अपने दोस्तों में घिरा बैठा था ।

 अमीर हमज़ा अबु जहल  के पास पहुंच गये , गुस्सा तो था ही , कमान  उठा कर इस जोर से उस के सर पर मारी कि उस का सर फट गया ,  फिर गरज कर बोले , अबु जहल ! सुन , मैं मुहम्मद सल्ल० के दीन पर है  ईमान लाया हूं । वोल , अगर तेरी कोई हिम्मत हो ।

 हज़रत हमज़ा के गुस्से और जलाल को देख कर अबु जहल  कांप गया ,  बोला , अमीर ! मुझ से वाक़ई गलती हुई ।

 अमीर हमजा का गुस्सा ठंडा हुआ तो हुज़ूर  सल्ल० को देखने और  तबियत मालूम करने आप के मकान की तरफ़ चल पड़े । वहां देखा कि  हजरत ख़दीजा और हज़रत फ़ातिमा हजरत मुहम्मद सल्ल० का सर धो  रही हैं और कपड़े को घाव में भरने के लिए जला रखा है ।

 हजरत अमीर हमजा आप के पास बैठ गये । आप ने हमदर्दी के अंदाज़  में कहा ।

 मेरे प्यारे भतीजे ! तुम को सुन कर बहुत खुश होना चाहिए कि मैं ने  बढ़कर अबू जहल  से तुम्हारा बदला ले लिया और इस ज़ोर से उस के सर  पर कमान मारी कि उस का सर फट गया ।

 हुजूर सल्ल० ने  हज़रत अमीर हमजा की ओर देख कर फ़रमाया - - -

 ऐ चचा ! मुझे इस बात से खुशी नहीं हो सकती कि आप ने मेरा  वेदला ले लिया है , मुझे तो खुशी उस वक्त होगी , जब आप इस्लाम में दाखिल हो जाएंगे ।

हज़रत हमजा हुजूर सल्ल० की हालत और हज़रत फ़ातमा के रोने  की कैफ़ियत देख कर पहले ही नर्म पड़ चुके थे , बे - अख्तियार बोले , अगर  तुम्हारी यही खुशी है , तो मुझे यह भी मंजूर है , तुम मुझे मुस्लमानकर  लो

हुजूर सल्ल० इस बात से खिल उठे । आप अपने ज़ख्म की टींसे   भूल  गए और मारे खुशी के फ़ौरन अमीर हुमज़ा की तरफ़ मुतवज्जह हुए , उन्हें कलिमा पढाया और हजरत हमजा मुसलमान हो गये ।  यह वाकिया  सन ०६ नबवी का है ।



Saturday, April 6, 2019

DARABAAR

 

DARABAAR(दरबार)

सुबह के वक्त मक्का के कुफ्फ़ार को मालूम हुआ कि कुछ मुसलमान  हिजरत कर के हब्शा की ओर चले गये हैं । यह एक नयी बात थी । इस  से मक्का के काफ़िरों में हलचल मच गयी । उन्हें ख्याल हुआ कि मुसलमान  हब्शा में जा कर हमारे माबूदों की बुराइयां बयान करेंगे । इस से उन के  मजहब की बेहद तोहीन होगी ,

             वे सब लोग एक जगह जमा हुए और अगले प्रोग्राम पर मश्विरा करना  शुरू किया ।

 तैय  हुआ कि साठ - सत्तर बहादुर जवानों को मुहाजिरों का पीछा करने से के लिए रवाना किया जाए । अगर मुहाजिर वापस आने पर तैयार हो  जाएं , तो ठीक है , वरना सब को क़त्ल कर डाला जाए ।

        सत्तर आदमी भेज दिये गये । ये लोग ऊंटों पर सवार होकर तेजी से  चले । लेकिन जब  जद्दा पहुंचे , तो मालूम हुआ कि अब हब्शा जाने वाला कोई जहाज नहीं है । जो जहाज़ बन्दरगाह पर खड़ा था वह मुहाजिरों को ले कर जा चुका है ।

       कुपफ़ारे मक्का को बड़ा  गुस्सा आया , पर वे कर ही क्या सकते थे ? मुहाजिर उन की पकड़ से बाहर हो गये थे । यह गुस्सा अब उन मुसलमानों पर और ज्यादा निकलने लगा , जो मक्के में मौजूद थे । उन्हों ने अब उन की जबरदस्त निगरानी शुरू कर दी और उन पर जुल्म की चक्की भी  तेज़ चला दी ।

         दर्द भरे मज़ालिम से मुसलमान इतने तंग आ गये कि उन का मक्का मुकरंमा में सांस लेना दूभर हो गया , इस लिए तंग आ कर चुपके - चुपके उन्होंने भी खुफ़िया तौर पर हिजरत शुरू कर दी । दो - दो , चार - चार करके रोज़ाना रात को छिप कर निकल जाते और जद्दा में पहुंच कर जहाजों के इंतिज़ार में छिपे रहते और जब कोई जहाज़ जाने लगता , उस पर बैठ  कर हब्शा रवाना हो जाते ।

कुफ्फारे मक्का के जुल्मों से तंग आ कर हजरत जाफ़र तयार बिन अबू तालिब ने भी हिजरत की और वह भी अपने मुसलमान भाइयों के  पास हब्शा पहुंच गये । इस तरह सत्तर - अस्सी मुसलमान हिजरत कर के हब्शा में जा पहुंचे और वे निहायत इत्मीनान से जिंदगी बसर करने लगे ।


                        दुश्मनों को जब मालूम हुआ कि मुसलमान हब्शा में खुशहाली की  जिंदगी जी रहे हैं , तो उन के सीने पर सांप लोट गया , उन्होंने मज्लिसे शुरा बुलायी । सभी बड़े लोग जमा हो गये ।

         जोरदार तकरीरें हुई । इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ़ ज़हर  उगला गया ।

आखिर में यह बात ते पायी कि नजाशी के हुजूर में कीमती तोहफ़े ले कर वफद  हाजिर हो , जो बादशाह के दरबारियों को हमवार कर के मुसलंमानों की वापसी की मांग कराये ।

        मक्का के कुरैश और हब्शा के बादशाह  नजाशी के बीच पहले तिजारती ताल्लुक़ात थे । इस लिए उन्हें पूरा यकीन था कि हब्शा का शाह इन  बेकस व बेचारे मुसलमानों को उन के वफद  के साथ भेज देगा । वफ्द  तयार किया गया ।अम्र बिन  आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को वफद   का सरदार बनाया गया और क़ीमती तोहफे और सामान दे कर उन्हें  रवाना कर दिया गया ।

      यह वफद  बड़ी शान के साथ जद्दा की ओर रवाना हुआ । जद्दा से जहाज़ में बैठ कर हब्शा जा पहुंचा । चूंकि शानदार वफ्द था , इस लिए पूरे हब्शा को इस की खबर हो गयी । मज़लूम मुसलमानों को मालूम  हुआ तो वह घबरा गये और उन्हें डर हुआ कि कहीं नजाशी उन को वपस  जाने पर मजबूर न करे ।

    उन्हों ने तै कर लिया कि हब्शा के बादशाह ने अगर हमें वफ्द के सुपुर्द  किया , तो हम किसी और तरफ़ निकल जाएंगे , लेकिन मक्का वापस न  जाएंगे ।

         कुरैश के वफद ने दरबारियों को तोहफ़े - तहाइफ़ देकर इस बात पर हैं तैयार कर लिया कि देश छोड़ कर आने वाले मुसलमानों को वापस मक्का जाने पर आमादा करें । उन्हों ने वायदा भी कर लिया । इस तरह नजाशी हैं के दरबार में वफ्द की पहुंच हो गयी । नजाशी ने शानदार तरीके से है दरवार सजाया ।

जब वफद दरबार में पहुंचा तो दरबार की सजावट देख कर हैरान रह  गया । अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ ने बड़े अदब से झुक  कर सलाम किया । उन के तमाम साथी जो  के साथ थे , नजाशी के सलाम के लिए झुक गये । सलाम कर के तो पेश किये ।

         नजाशी ने पूछा , अरबो ! तुम मेरे दरबार में किस लिए आये हो ? हैं और क्या चाहते हो ?

 अम्र बिन आस ने कहा , हमारी क़ौम ने एक जुट हो कर हमें आप के  हुजूर में इस लिए भेजा है कि हुजूर से अर्ज करें कि हमारे शहर में एक जादूगर पैदा हुआ है , उस का नाम मुहम्मद है । उस ने एक नया मज़हब  ईजाद किया है , ऐसा मजहब , जो किसी और मज़हब से मेल नहीं खाता , हैं बिल्कुल नया मज़हब । हमारे शहर के कुछ नादान लोगों ने इसे कुबूल है कर लिया है । हम ने जब इन पर जोर दिया कि इस नये मज़हब को छोड़ दें , तो वे बेवकूफ़ वहां से भाग कर हुजूर की हुकूमत में आ गये हैं । हम हैं उन को वापस ले जाने के लिए हुजूर के दरबार में हाज़िर हुए हैं ।

     नजाशी को उन की बातों को सुन कर बड़ा ताज्जुब हुआ और उस ने  है कहा , नया मजहब ईजाद किया है , लोग जादू के शिकार हो गये हैं । यह  समझ में आने वाली बात नहीं है ।

 अम्र बिन आस ने कहा , जनाब ! हम को खुद अफ़सोस है । मुहम्मद है ऐसा जादूगर है । जो उस से एक बार बात कर लेता है , वह उस का  आशिक हो जाता है । उस ने हमारी क़ौम में एक नया फ़िटना पैदा कर  दिया है , नया मजहब ईजाद किया है । हुजूर उन लोगों को बुला कर हैं मालूम कर लें ।

           नजाशी ने कहा , मैं ज़रूर बुलाऊंगा । मुझे उन के देखने का शौक़ है । वे अपने आप को क्या बतलाते हैं?

    अम्र बोला , वे खुद को मुसलमान कहते है । भला मुसलमान भी । किसी मज़हब का नाम हो सकता है ?

      अब वजीरे आज़म उठा , यह बूढ़ा आदमी था । उस ने कहा , हजर ! ये मुसलमान नये मज़हब के मानने वाले हैं । मैं इन से मिल चुका हु  । वे अजीब अक़ीदा रखते हैं , न यहूदी , न ईसाई , न बुतपरस्त । मुझे डर है  हैं कि वे कहीं अपने नये मजहब की तब्लीग मुल्क हब्शा में न कर दें । इसलिए  मेरे ख्याल में उन तमाम लोगों को इस वपद के साथ रवाना कर दीजिए और अपने मुल्क और अपनी क़ौम को उन की शरारतों से बचाइये ।

 नजाशी ने कहा , अभी कुछ नहीं कहा जा सकता । अच्छा मुसलमानों में  को बुलाओ ।

    वजीर ने करनल की तरफ़ इशारा किया । वह दरबार से बाहर आया , कुछ सिपाहियों को साथ लिया और मुसलमानों की ओर चल पड़ा । मुसलमानों को पहले ही डर था । वह सहम रहे थे कि अब क्या होता है । मक्का है में उन पर इतनी सख्तियां हुई थीं कि वे वहां जाने पर मौत को तर्जीह  देते थे । उन्हों ने आपस में तै कर लिया था कि मर जाएंगे , मगर यहां है हरगिज़ न जाएंगे ।

            जब ईसाई सिपहसालार उन की तलबी के विए आया , तो सब लोग है उस के दरबार में पहुंचे , सब ने बादशाह को सलाम किया । नजाशी ने हैं उन को बैठने के लिए कुसियां डलवायीं ।  

     जब सब बैठ गये , तो नजाशी ने पूछा , क्या तुम ने कोई नया मज़हब  ईजाद किया है , जो ईसाइयत और बुतपरस्ती दोनों के खिलाफ़ है ?

         हजरत जाफ़र जवाब देने के लिए खड़े हुए । 

 आप ने फ़रमाया , ऐ बादशाह ! ऐ लोगो ! हम लोग जाहिल थे , बुतपरस्त थे , बुतों को पूजते थे , मुरदार खाते थे , हराम - हलाल की कोई  तमीज़ न थी , बदकारियां करते थे , पड़ोसियों को सताते थे , भाई - भाई पर  जुल्म करते थे और हर मज़बूत हर कमज़ोर को पीस डालता था , गोया  दुनिया भर के एब हम में थे । खुदा ने हम पर रहम किया और अपने  प्यारे नबी को हम पर भेजा । उस नबी  की शराफ़त , दयानत और सदाक़त  को हम खूब जानते थे । उसने हम को इस्लाम की दावत दी । हमें सिखाया कि हम पत्थरों को पूजना छोड़ दें , हमेशा सच बोले , खुरेजी न करें , यतीमों । । का माल न खाएं , पड़ोसियों को आराम दें । नमाज़ पढे , रोजे रखें , जकात  दें । हम ने उस की दावत मानी , खुदा पर ईमान लाये , शरारत और बुतपरस्ती छोड़ दी , बदकारियों से तौबा की । इस जुर्म में हमारी कौम हमारी है दुश्मन हो गयी और हम पर सख्तियां करने लगी । हम पर ऐसे - ऐसे जुल्म  किये गये , जिन को सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । हमें मजबूर किया  गया कि हम फिर तबाही के गढ़ में गिर पड़े । हमने तंग आ कर पनाह ली । है अब ये हम पर फिर जुल्म व सितम करने के लिये यहां से ले जाना चाहते ।


    नजाशी और तमाम दरबारी पूरी तवज्जोह से हज़रत जाफ़र की बाते  सुनते रहे । जब खामोश हुए तो नजाशी ने कहा , जो बातें तुम ने बयान  की हैं , वे तो कुछ बुरी नहीं ।

 हज़रत जाफ़र ने कहा , आप इन से पूछिए कि क्या हम इन के गुलाम है ?

 अब मुसलमानों की बात नजाशी के वास्ते से अम्र बिन आस से शुरू हुई ?

अम्र ने जवाब दिया , इस में से एक भी गुलाम नहीं है , सब के सब  आजाद हैं ।

हज़रत जाफ़र ने फिर पूछा , हम में से किसी ने किसी का खून किया है ?
तुम्हारा दामन इस इल्जाम से भी पाक है । जवाब  मिला  ।
हम में से किसी ने किसी का माल चुराया है ?
नहीं ।

 हम में से कोई आप का या आप की कौम के किसी आदमी का क़र्ज खाये हुए है ?

यह बात भी नहीं है ।

 क्या तुम्हारी दिली मंशा यह नहीं है कि हम तुम्हारे मजहब में लौट आएं ?

बेशक , हम यही चाहते हैं ।

क्या तुम बुतों को नहीं पूजते हो ?

हमारे बाप - दादा का मज़हब यही हैं । तुम्हारे बाप - दादों का भी  यही मजहब था , अब तुम ने नया दीन अपना लिया है ।

जब नजाशी ने देखा कि बात बढ़ती जा रही है , तो दोनों को खामोश में रहने का हुक्म दिया । दोनों चुप हो गये ।

 नजाशी ने हजरत जाफ़र तैयार से कहा , तुम्हारे नबी पर कोई किताब  भी नाज़िल हुई है ?

 हजरत जाफ़र तैयार ने जवाब दिया , हां हमारे मोहतरम नबी पर कुरआन मजीद नाजिल हो रहा है ?

 उस ने फिर पूछा , तुम्हें कुरआन का कोई हिस्सा याद है ?

याद है ।

 तो सुनाओ ।

तमाम मुसलमान हाथ बांध कर खड़े हो गये । हज़रत जाफ़र ने सूरः  मरयम की तिलावत शुरू की । आप ने बड़ी अच्छी आवाज़ में पढ़ना शुरू  किया , जिस में कहा गया था -

तेरे परवरदिगार की रहमत बन्दा जकरिया को याद करती है । जिस वक्त उस ने अपने पालनहार को धीरे से पुकारा । उस ने कहा , ऐ परवर दिगार ! मेरी हड्डियां सुस्त हो गई हैं , मेरे सर ने बुढ़ापे का शोला मारा  है  और मेरे परवरदिगार ! मैं तुझे पुकारने में बद - नसीब न था और मैं डरता हु की मेरा कोई वारिस नहीं है  । मेरी औरत बांझ है । ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे अपने पास से वली बख्श , ताकि मेरा वारिस हो और ऐ
मेरे परवरदिगार ! उसे पसन्दीदा कर ।

 हजरत जाफ़र तैयार इतनी अच्छी आवाज़ में कुरआन मजीद पढ़ रहे  थे कि तमाम दरबार उस प्यारी आवाज़ से भर गया । नजाशी , वज़ीर , दरबारी सब सर झकाये बैठे बड़ी तवज्जोह से सुन रहे थे । नजाशी की  शान कह रही थी कि वह बहुत कुछ जब्त कर रहा है , उस से न रहा गया और बेक़ाबू हो कर उस के आंसू जारी हो गये ।

हजरत जाफ़र कुछ और आयतें पढ़ कर खामोश हो गये । देर तक  आप की आवाज गूंजती रही । कुछ देर बाद नजाशी ने सर उठाया , रेशमी रूमाल से आंसू पोंछा और कहा -

खुदा की क़सम ! इस कलाम से सच्चाई की बू आती है । यह ऐसा ही कलाम मालूम होता है , जैसा कि तौरात में है । मैं इक़रार करता हूं कि  हैं यह कलाम इंसान का कलाम नहीं है , बल्कि यह खुदा का कलाम है ।

 नजाशी के इन लफ्ज़ों से जहां मुसलमान इसलिए खुश हुए कि उन्हें  उम्मीद हुई कि शाह नजाशी उन्हें कुरैश के वपद के हवाले न करेगा , वपद ! वालों को यह डर हुआ कि शायद वे यहां से नाकाम हो जाएंगे ।

 अम्र  बिन आस ने नजाशी से कहा , हुजूर ! ग़ज़ब तो यही है कि जब  वह कलाम पढ़ते हैं , जो मुहम्मद (सल्ल०) उन को लिख कर देता है , तो  सुनने वाले पर बड़ा असर होता है । यह कलाम खुदा का कलाम नहीं है , बल्कि मुहम्मद का कलाम है ।

 हज़रत जाफ़र तैयार को अम्र की इस बेहूदा बात पर बड़ा गुस्सा आया है हैं और गुस्से की वजह यह थी कि अम्र अच्छी तरह जानता था कि हुजूर  सल्ल. अनपढ़ हैं , लेकिन नजाशी को धोखा देने के लिए अब कह रहा था  कि वह लिख कर देते हैं । उन्हों ने जोश में आकर कहा , अम्र ! सच है बोलो , क्या तुम नहीं जानते कि हुजूर उम्मी अनपढ़ ) हैं ।

 नजाशी भी बोल पड़ा , लगता है , तुम झठ बोलते हो । जब तुम इस  बात के क़ायल हो कि वह लिखना - पढ़ना नहीं जानते , तो एक अनपढ़ का  कलाम इतना जोरदार हो सकता है ? तास्सुव ने तुम को अन्धा कर दिया  हैं । तुम सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनते हो ।

 अम्र डर गया । उसे डर हुआ कि शायद नजाशी उसे और उस के  साथियों को दरबार से न निकलवा दे । उस ने फ़ौरन कहा , एक बात  कहने की रह गयी है ।

नजाशी ने पूछा , वह क्या है ?

 अम्र ने कहा , ये लोग हजरत ईसा के बारे में बुरी - बुरी बाते कहते है ।


उन्हें खुदा का बेटा नहीं मानते ।

 एक पादरी ने खड़े होकर अम्र के इन लफ्ज़ों की ताईद की और कहा , हैं यह बात बिल्कुल सही है । ये नये मज़हब के मानने वाले खुदावन्द ( हज़रत  ईसा ) की शान में गुस्ताखी की बातें करते हैं ।

यह सुन कर नजाशी को गुस्सा आ गया । उस ने हज़रत जाफ़र तैयार हैं से कहा कि क्या यह सही है कि तुम हज़रत ईसा की शान में गुस्ताखी करते  थे ?

 हजरत जाफ़र तैयार ने पूरी हिम्मत से काम लेते हुए जवाब दिया , यह बात भी गलत है । हम ईसा अलैहिस्सलाम को नबी मानते हैं और उनके की शान में वही कहते हैं , जो खुदा ने उन की शान में फ़रमाया है ।

 क्या है ? नजाशी ने कहा ।

हज़रत जाफ़र ने कहा , अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया , ' वह अल्लाह के बन्दे और उस के रसूल हैं और उस का हुक्म हैं , उन को मरयम की तरफ़  डाल दिया और रूह की तरफ़ से हैं

नजाशी ने कहा , खुदा की क़सम ! इंजील में भी यही लिखा है । तुम  सच कहते हो ।

अब अम्र को यक़ीन हो गया कि नजाशी मुसलमानों को उन के हवाले हैं न करेगा । उस ने कहा , बादशाह ! हमारे यह आदमी हैं , जो हम से , हैं अपनी क़ौम से और अपने मुल्क और अपने माबूदों से बाग़ी होकर भाग  आए हैं , इसलिए आप इन को हमारे हवाले कर दें , यही बेहतर है ।

 नजाशी को जोश आ गया , बोला , हरगिज नहीं , उन्हें मेरे मुल्क से कोई  ताक़त नहीं लेजा सकती । तुम मुझको लालच देने के लिए ये तोहफ़े लाये हो , हैं इनको वापस ले जाओ और कुरैश के सरदारों से कह दो कि हब्शा का बादशाह एक मुस्लमान को भी तुम्हें वापस न देगा और ऐ मुसलमानो !  तुम आजाद हो , पूरी वे - फ़िक्री से तुम यहां रहो । जब तक मैं जिंदा हु , कोई तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता ।

हज़रत जाफ़र तैयार और तमाम मुसलमानों ने नजाशी का शुक्रिया  अदा किया । वह नजाशी के दरबार से विदा होकर अपने ठहरने की जगहों  पर चले गये ।

 कुरैशी वफ्द तमाम तोहफ़ों को लेकर बड़ी बद - दिली से विदा हुआ  और उसी दिन जहाज़ पर बैठ कर जद्दा की तरफ़ रवाना हो गया ।

https://alameainah.blogspot.com/2019/04/habsha-ki-hizrat.html

#alameainah