दिल हिला देने वाला जुल्म (dil hila dene vaala julm)
कुफ्फ़ारे कुरैश ने जो अदनामा तैयार कर के काबे के दरवाजे पर लटकाया था , उस में बातें तो बहुत कुछ लिखी थीं , लेकिन जिक्र करने लायक़ कुछ ही बातें थीं । एक तो यह कि जब तक मुसलमान इस्लाम से फिरे नहीं और बुतपरस्ती न अपनाएं , बाईकाट बराबर जारी रहेगा । दूसरे जो लोग हुजूर सल्ल० के पास रहेंगे या उन का साथ देंगे , जैसे अबू तालिब है वगैरह , उन का भी बाईकाट बराबर जारी रहेगा । कबीला बनू हाशिम से अबू लहब को छोड़ कर , मेल - जोल , शादी - ब्याह और लेन - देन वगैरह सब उस वक्त तक बन्द रहेगा , जब तक अबू तालिब मुहम्मद सल्ल० का साथ न छोड़ दें । ये और इसी क़िस्म के बहुत से कायदे उस में दर्ज थे ।
काबे के दरवाजे पर अहदनामा लटकाये जाने से तमाम लो उस अहदनामे का एहतिराम करना शुरू कर दिया । इस बाईकाट की बुनियाद पर आमख्याल ही पाया जाने लगा कि अब मुसलमानों के दिमाग ठीक हो जाएंगे , वे टूटेंगे , इस्लाम छोड़ देंगे , इसलिए वह हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा ।
दुनिया की तारीख में इस किस्म के बाईकाट की मिसाल इससे पहले नहीं मिलती कि खुद वतन वालों ने किसी गिरोह के लिए जबरदस्त बाईकाट किया हो कि लोग दाने - दाने को मुहताज हो जाए ।
दर्रा अगरचे लम्बा - चौड़ा न था , पर इस में दिलचस्पी का कोई सामान न था , न जरूरत न जिदगी की कोई भी पैदा होती था । मुसलमान निहायत तंगी से मजबूरी की हालत में अपनी जिदगी के दिन काट रहे थे , खाने - पीने का सामान काफी था , यह मालुम न था कि बाईकाट कब तक रहेगा , इसलिए खाने - पीने में बड़ी एहतियात करते थे । मुसलमानों के साथ बच्चे भी थे , औरतें , बूढ़े और जवान भी थे ।
नौजवान तो भूख और इसलिए वह प्यास बर्दाशत कर सकते थे , पर बूढ़े और बच्चे न कर सकते थे । मजबूरी सब कुछ करा देती है । बेचारे बर्दाशत कर रहे थे । या बर्दाशत करने की आदत डाल रहे थे । सन् ०७ नबवी के मुहर्रम के महीने से यह बाईकाट शुरु हुआ था । अब जिलहिज्जा आ गया था , गोया पुरा एक साल बाईकाट जारी रहा ।
मुसलमान भूख और प्यास की शिद्दत से निढाल और बे-हाल हो रहे थे । जो सामान ले आये थे , वह खत्म हो गये थे और सामान कौन लाता और किस तरह से लाता । मजबुरी से मुसलमान पेड़ के पत्ते खा कर दिन काट रहे थे ।
चूंकि जिलहिज्जा के महीने में हज होता है । हज के दिनों में हर आदमी पर से पाबन्दियां उठा दी जाती थी , इसलिए मुसलमानों पर से पाबन्दियां उठा ली जाती है । घेराव उठा लिया गया । मुसलमान दर्रे से बाहर निकले इस हाल में कि तन पर फटे - पुराने कपड़े थे , भूख से कमजोर और निढाल थे , चलते हुए लड़खड़ाते थे ।जालिम से जालिम आदमी भी इस हालत को देखकर रहम खा सकता था , मगर कुफ्फारे मक्का के दिल में रहम नाम की कोई चीज जैसे बाकी न रह गई हो वे जरा भी न पसीजे ।
मुसलमानों ने सबसे पहले काबा में जाकर नमाज पढ़ी । तवाफ किया , हज से फारिग होकर बाजारों में खरीद में रोल लिए गए ।
अबू जहल साथ गया । बावजूदे कि आज हज का दिन था . कोई मनाही न थी , लेकिन वह आज भी लोगों को मुसलमानों के हाथ चीजें बेचने से मना कर रहा था ।
तमाम कुफ्फार अबू जहल की तरह ज़ालिम न थे , ज्यादातर लोग ने मुसलमानों की हालत पर रहम खा कर उन के हाथ सामान बेचा । शाम तक मुसलमान जितना सामान ले सकते थे ले आए और इस के बाद फिर दरें में चले गए और पाबन्दी लग गयी ।
जब तक मुसलमानों के पास खाने - पीने का सामान रहा , एहतियात से थोड़ा - थोड़ा खाते रहे , पर जब खाने - पीने का सामान खत्म होने लगा , तो है फिर फ़ाक़ों की नौबत आ गयी । मुसलमान खुद कम खाते , बच्चों को अच्छी तरह खिलाते , मगर अच्छी तरह क्या खिलाते , सिर्फ एक वक्त थोडा सा सत्तू घोल कर पिलाते थे । रात और दिन में सत्तू के कुछ घूंट क्या सहारा देते , कुछ ही घंटों बाद फिर भूख लग जाती । खाने के लिए बच्चे चिल्लाते , जिद करते , रोते लेकिन खाना कहां था , जो दिया जाता । उन्हें बहलाया जाता । सुबह कहते कि शाम को खाना मिलेगा , बच्चे शाम के इन्तिजार में चुप हो जाते , मगर जब शाम हो जाती , खाना न मिलता , भूख ज्यादा लगती तो फिर रो कर खाना मांगते थे । उन के रोने से हर मुसलमान का दिल मुतास्सिर होता था , मगर कर क्या सकते थे ? खाना कहां है । कैसे उन को खिलाते ? तमाम बच्चे सूख कर कांटा हो गये थे ।
कुरेश की जालिमाना पाबन्दी से , मुसलमानों की जिदगी अजीरन हो गयी थी । वे हुज़र सल्ल० से लड़ाई की इजाजत मांगते थे और आप इजाजत न देते थे । बगैर हुजूर सल्ल० की इजाजत के वे काम न करते थे । सब्र व इस्तिक्लाल से वे सख्तियां बर्दाश्त कर रहे थे ।
सन् ०८ नबवी का साल सख्त गुज़रा , फिर हज का जमाना आया और मुसलमानों के ऊपर से निगरानी उठा ली गयी । मुसलमान दरे से बाहर आए । इस बार वे ज्यादा कमज़ोर और निढाल थे ।
कुफ़ारे मक्का ने उन की यह हातल देखी , तो वे हंसे और उन में से हैं । अक्सर लोगों ने कहा , मुसलमानो ! क्यों इतनी सख्तियां बर्दाश्त कर रहे हो ? यह क्या ज़िदगी है ? न खाने को रोटी है , न पहनने को कपड़ा , अफ़सोस है ऐसी जिंदगी पर । तुम हमारे भाई हो । हम को तुम्हारी हालत देख कर अफ़सोस होता है । मुहम्मद सल्ल० का साथ छोड़ दो । बाप - दादा का मज़हब अपना लो । तुम्हारे लिए जिंदगी की जरूरतें पूरा कर दी जाएंगी ।
मुसलमानों ने जवाब दिया , हम ने खुदा को पा लिया है , उस का मज़हब अपनाया है । तुम हम पर चाहे जितना जुल्म करो , खाना न दो , पानी न दो , जब तक जी चाहे , बाइकोट किये रहो , हम इस्लाम का रास्ता न छोड़ेंगे ।
कुफ्फ़ारे मक्का को यह जवाब बहुत नागवार गुजरा और उन्होंने कहा , अगर तुम मरना ही चाहते हो , तो सिसक - सिसक कर मरो , हम कर ही क्या सकते है ?
मुसलमानों ने हज किया । हज से फारिग होने के बाद बाजार में पहुंचे , कुछ सामान वगैरह खरीदा और फिर वह दरें में चले आए , फिर पहरा कायम कर दिया गया ।
इस बार पिछले वर्षों के मुकाबले में ज्यादा सख्ती की गयी । दिन गुजरने लगे । सन् ०६ नबवी शुरू हो गया । यह साल मुसलमानों पर बहुत सख्त गुज़रा । खाने - पीने को सामान बहुत जल्द खत्म हो गया और फ़ाक़ों पर नौबत आ पहुंची । मर्द और औरतें तो फ़ाक़ा करते - करते घास हैं और पेड़ों के पत्ते और छाल वगैरह जो मिल गयी थी , खा लेते थे , पर बच्चे ये चीजें न खाते थे , वे रोते थे , सत्तू के एक घुट के लिए खजूर के एक दाने के लिए तरसते थे । भूख से बेताब हो कर बेहोश हो जाते थे । उन्हें मौत से क़रीब और जिन्दगी से दूर देख कर मां - बाप के कलेजे मुंह को आते थे , पर सब्र की सिल सीने पर रख कर खुदा की रहमत का इंतिज़ार कर रहे थे । मुसलमानों ने अपने चमड़े के मोज़ों को पानी में भिगो कर नर्म किया फिर भून कर कर बच्चों को खिला दिया , यहां तक कि चमड़े के मोजे भी खत्म हो गये , और बच्चे भूख से बेताब हो गये , लेकिन मुसलमान बेचारे करते भी तो क्या करते ।
अक़ील उम्र में सबसे छोटा बच्चा था । भूख ने उस को इतना कमजोर कर दिया था कि उठ न सकता था । हर वक्त पत्थर की चट्टान पर पड़ा रहता था । मां - बाप और उस की इस हालत को देखते , लेकिन वे करते ही क्या ।
अक़ील पर ग़फ़लत तारी हो गयी । मां का कलेजा प्यारे बेटे को ग़ाफ़िल देख कर टुकड़े - टुकड़े हुआ जा रहा था । अक़ील बीमार न था , बल्कि भूख की ज्यादती ने उसे मौत के किनारे पहुंचा दिया था ।
अक़ील ने आंख खोली , हसरत भरी नज़रों से मां को देखा । मां तड़प गयी । उस ने अपने जिगर के टुकड़े को गोद में ले कर सीने से लगाया , मुह चूमा और बोली , बेटा अक़ील ! क्या तुम मुझे दगा दे जाओगे ? ऐ अल्लाह ! भेरे बने को बना ले , आह , मेरा बच्चा भूख से दम तोड़ रहा है । लोगो ! मैं कैसे जब्त करू ?
दर्दमन्द मां ने यह कहते ही बे - अख्तियार रोना शुरू कर दिया । लोग उसके पास बैठे थे , उन के भी आंसु जारी हो गये ।
अकोल ने अपनी मां के गले में बाहें डाल कर निहायत कम है । आवाज में कहा , मा भूख ‘ रोटी ।
अकील बेहोश हो गया । मां के भी आंसु जारी हो गये । उस ने सिसकियां भरते हुए कहा , आह , क्या चीज खाने को दें ? हाय मेरे बच्चे ! केसे में तुझे बचाऊ ? अल्लाह ! रहम कर मेरे बच्चो पर , मैं अपने बच्चो को भूख से तड़प - तड़प कर मरते हुए कैसे देखें ?
पास ही अक़ील का बाप भी बच्चे की हालत देख कर रो रहा था ।
अक़ील की हालत बद से बदतर हो गयी , आंखें बन्द होने लगीं । मां बाप तड़प गये यह देख कर कि अक़ील का आखिरी वक्त आ गया है । मां जब्त न कर सकी . अपना सर पत्यर पर दे मारा , खून का दरिया बह निकला । दूसरी औरतों ने लपककर उसे संभाला । अकील का बाप अपनी बीवी की हालत पर जब्त न कर सक । फूट - फूट कर रोने लगा ।
तमाम औरतों और बच्चों पर इस का बेहद असर हुआ । सब जोर जोर से रोने लगे । रोने की आवाज दरें में गुंज कर बाहर निकली । संगदिल पहरेदार रोने की आवाज़ सुन कर खुश हो गये । उन्होंने कहा , । अब ये लोग मरने लगे है , यक़ीनन कोई मर गया है , जो ये लोग रो रहे हैं । यकीन है कि अब ये सब बाप - दादा के मजहब में आ जाएंगे या भूख प्यास से मर जाएंगे ।
अक़ील और उस की मां की हालत चिन्ता मे डालने वाली बनती जा रही थी ।
अबू तालिब भी पास बैठे देख रहे थे । उन से जब्त न हो सका ।
वह उठ कर आप के पास पहुंचे । हुजूर सल्ल० सज्दे में पड़े हुए थे । कुछ देर । बाद जब आप ने सज्दे से सर उठाया , तो अबू तालिब ने कहा , मेरे प्यारे भतीज ! अव हालात बहुत खराब हो गये हैं , सत्र का दामन हाथ से छूटने वाला है । बच्चे भूख के मारे मरने वाले हैं । मैं कुरेश से जा कर रहम की दरख्वास्त करता हूं ।
आप ने फ़रमाया , चचा ! मुझे खुदा ने खबर दी है कि जो जालिमाना अदह नामा लिखवाया गया था , उसे कीड़े ने खा लिया है । जिस जगह अल्लाह का नाम लिखा है , वही बची है । थोड़ा और रुक जाइये , अल्लाह यक़ीनन मदद करेगा ।
अबू तालिव ने कहा , अच्छा , और मैं थोड़ी देर इन्तिजार करूंगा ।
हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया , आओ , अक़ील को देखें । मैं ने उस के लिए दुआ की है ।
दोनों उठ कर चले । जब वे अकील के पास पहुंचे , तो वह ग़फ़लत में था । हुजूर सल्ल० बैठ गये । आप ने उसे अपनी गोद में उठा लिया । ठीक उसी वक्त हज़रत ख़दीजा एक हाथ में कुछ दूध और दूसरे हाथ में कुछ खाना लिए हुए आयीं । उन्होंने फ़रमाया , मेरे भतीजे हकीम ने यह सामान मेरे लिए भेजा है । यह थोड़ा - थोड़ा कर के सब बच्चों को खिला दो ।
हुजूर सल्ल० ने दूध लेकर अक़ील के हलक में टपकाया । कुछ देर बाद उस ने आंखें खोलीं । हुजूर सल्ल० ने प्याला उस के होंठों से लगा दिया । उस ने बड़ी बे - सब्री से दूध पिया और कुछ ही घूट में तमाम प्याला खाली कर दिया ।
अबू तालिब ने हज़रत ख़दीजा का खाना तमाम बच्चों में बांट दिया ।
अक़ील की हालत सुधर गयी । मां - बाप की जान में जान आयी । तमाम मुसलमान बहुत खुश हुए । अब हुजूर सल्ल० ने अबू तालिब से में कहा कि आज बाईकाट खत्म हो जाएगा ।
अबू तालिब उठ कर रवाना हुए ।
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