बाईकाट
हजरत उमर के मुसलमान होने से कुपफ़ारे मक्का में एक हंगामा मच गया । हर आदमी ने हैरत और अफसोस के साथ यह खबर सुनो । मुसलमानों ने खाना काबा में नमाज पढ़ी , तो इसे बुतों की तौहीन समझा गया ।
तमाम मक्के में गम और गुस्से की एक लहर दौड़ गयी ।
हज़रत उमर के इस्लाम ने मुसलमानों का हौसला इतना बढ़ा दिया था कि वे आजादी के साथ चलने - फिरने लगे , खरीद व फरोख्त करने लगे , खाना काबा में नमाज़ अदा करने लगे । किसी को उन्हें रोकने और छेड़ने की हिम्मत न होती ।
इस आजादी की खबर हब्शा तक पहुंच गयी । जो मुसलमान वहां हिजरत कर के पहुंच गये थे , वे समझे कि अब कुरैश ने मुखालफ़त बन्द कर दी है और मुसलमानों को आजादी से रहना - सहना नसीब हो गया है । उन में से अक्सर अपने वतन लौट आए , पर जब यहां आकर मालूम हुआ कि अभी कोई आजादी वगैरह नहीं मिली , कुफ्फ़ारे मक्का अपनी जिद से बाज़ नहीं आए , तो फिर हबशा वापस चले गये । इसे हब्शा की दूसरी हिजरत कहते हैं ।
उस वक्त मक्के में सिर्फ चालीस लोग थे , जिन्होंने इस्लाम कुबूल किया था । इन के अलावा ८६ मुसलमान वे थे , जो हिज़रत करके हब्शा चले गए थे । इस तरह मुसलमानों की कुल तायदाद १२३ होती थी । अगरचे । तायदाद मामूली थी , पर कुफ्फार को मुसलमानों की इस तायदाद से से भी डर हो गया था कि इसी तरह अगर ये बढ़ते रहे , तो तमाम मक्का सारा अरब मुसलमान हो जाएगा । इस ख्याल ने उन्हें बदला लेने की तदबीरों पर गौर करने के लिए फिर मजबूर कर दिया ।
उन्होंने मुहर्रम सन् ०७ नबवी में एक मज्लिसे शूरा बुलायी । तमाम कबीलो के सरदारों को बुलाया गया । बड़ी शान व शौकत से इज्लास की तैयारी की गयी । तमाम लोग बड़े जोश से शामिल हुए ।
जब ये तमाम लोग आ गये , तो अबू सूफ़ियान की सदारत में इज्लास हैं शुरू हुआ ।
अबू जहल खड़ा हुआ और उस ने कहा , ऐ गैरतमंद अरबो ! तुम ने देखा कि जिस बात को हम ने बच्चों का खेल समझा था , वह बढ़ते - बढ़ते हैं । हमारे दीन के लिए मुस्तक़िल खतरा बन गयी है । लोग अपने बाप - दादा के मजहब को छोड़कर के नये मजहब को अपनाने लगे हैं । मुहम्मद हमारे मजहब को मिटा कर नया मजहब रिवाज देने में दिन व रात लगे हुए हैं । वह कहते हैं , आक़ा - गुलाम सब बराबर हैं । पिछड़ों और ग़रीबों वगैरह को उन्होंने सर पर चढ़ा लिया है । मेरे ख्याल में कोई अरब , जिस में ज़रा भी खुद - दारी है , उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता । इस के अलावा सब से बड़ी सब से अहम और सब से ज्यादा खतरनाक जो बात है , वह यह है कि हर हैं मुसलमान बुतों को हिकारत से देखता है गोया उन की नजरों में हमारे मज़हब की और हमारे माबूदों की कोई अहमियत नहीं है बताइए , क्या हम इस जिल्लत को बर्दाश्त कर सकते हैं ?
हर तरफ़ से आवाजें आयीं , हरगिज़ नहीं ।
अबू जहल ही ने बात और आगे बढ़ायी ।
अगर नहीं बर्दाश्त कर सकते , तो फिर चुप क्यों बैठे हो ? क्या सोच रहे हो ? किस चीज का इन्तिज़ार है ? तुम ने देख लिया कि बावजूद हमारी कोशिशों के मुसलमानों की तायदाद दिन ब दिन बढ़ती चली जा रही है । अगर कोई इन्तिजाम न किया गया , तो अंदेशा ही नहीं , बल्कि यकीनी बात है कि तमाम मक्का , बल्कि तमाम अरब मुसलमान हो जाएंगे । आप को मालूम है कि मुसलमानों की कितनी बड़ी तायदाद हब्शा को चली गयी है, क्या वे लोग चुपचाप बैठे होंगे? वहा जिस वक़त उन की तायदाद बढ़ जाएगी , यक़ीनन वे मक्के पर हमला करेंगे । कोई नहीं कह सकता कि अंजाम वया होगा ? याद रखिए , अभी तो इस की शुरूआत है , को करने से इस की रोक - थाम की जा सकती है , लेकिन अगर कोताही की गयी , तो फिर इस बहाव पर बन्द नहीं बांधा जा सकेगा । अजब नहीं अरब से हमारे माबूदों को , हमारे मजहब वालों को बड़ी बे आबरू से निकलना पड़े , क्या तुम इसे पसन्द करोगे ?
हम इसे हरगिज़ , हरगिज़ गवारा न कर सकेंगे सब ने एक साथ । अबु जहल ने कहा , मुझे भी यही ख्याल है कि तुम हरगिज़ गवार कर सकोगे , मगर इस खतरे को मिटाने के लिए क्या उपाय किया जाये ?
कुछ आवाज आयीं , उपाय सोचना बड़े आदमियों का काम है । हमारा काम सिर्फ इन पर अमल करना है ।
अबू जहल ने कहा , निहायत ही मुनासिब बात है । आज बडे लोग इसीलिए जमा हुए है कि एक राय हो कर कोई ऐसा उपाय सोचे , जिससे इस्लाम का खतरा मिट जाए , मुसलमानों की जड़ कट जाए और फिर आराम की नींद सो सके ।
उत्बा ने कहा , खतरा मुहम्मद सल्ल० की तरफ़ से है । जब तक जिदा हैं , यह खतरा मिट नहीं सकता । मेरे ख्याल में तो कुछ लोग जाये और उन्हें कत्ल कर के खतरे को मिटा डाले ।
जुबैर बिन उमैया ने कहा , सब लोग अच्छी तरह से जानते है कि मुहम्मद सल्ल ० हाशिमी खानदान से हैं । कुरैश में यह खानदान सब से ज्यादा इज्जत वाला है । इसलिए उन्हें कत्ल करने से डर है कि खाना जगी शुरू हो जाएगी । इस के अलावा यह कैसे मुम्किन है कि मुसलमान उन्हें है आसानी से मरने देंगे । वे जब तक खुद न मरेंगे , अपने नेता पर आंच न आने देंगे । इसलिए यह काम आसान नहीं है ।
उत्बा ने कहा , अगर तमाम लोग मिल जाएं , तो तज्वीज़ बताए देता है । सब लोगों ने कहा , हम सब मुत्तफ़िक़ हैं । आप बताएं ।
उत्वा ने बताया , मुसलमानों का वाईकाट करो । व्याह , शादी , लेन - देन रस्म व रिवाज़ . मुलाक़ात , खाना - पीना , खरीद व फ़रोख्त वगैरह सब बंद कर दो । उन्हें मजबूर करो कि ये बस्ती में न रहे , बल्कि पहाड़ पर चढ़ जाएं । यह निगरानी की जाये कि खाना - पीना और किसी क़िस्म का कोई १ सामान उन के पास न पहुंचे । इस तरह खुद तड़प - तड़प कर मर जाएग और हमें किसी को मारने , उस के क़बीले को खून बहा अदा करने की नौबत ही न आएगी ।
इस तज्वीज को सुनकर सब खुश हो गये । खूब तालियां बजीं ।
जब जरा खामोशी हुई तो जुबैर ने कहा , मेरे ख्याल में यह बहुत ही हैं जालिमाना काम है , इस से तो बेहतर यह होगा कि उन्हें कत्ल ही कर दिया जाए ।
अबू लहब ने कहा , जुबैर इस तज्वीज़ को मंजूर कर लो , इस से हमारा मक्सद मुसलमानों को भूखा , प्यासा रख कर क़त्ल करना नहीं है , बल्कि उन्हें मजबूर कर के इस्लाम से अपने मजहब में वापस लाना है ।
जुबैर ने कहा अगर सिर्फ इस तरीके से तंग और परेशान करना मंजूर हैं , हैं तो मुझे कुछ उज्र नहीं मैं शरीक हूं , लेकिन तुम इस तरह से उन्हें अगर क़त्ल करना चाहो , तो मुझे शिर्कत मंजूर नहीं ।
हम उन्हें क़त्ल करना तो चाहते ही नहीं , सिर्फ उन्हें दिक़ करना चाहते हैं । अबू जहल ने कहा , बहुत जल्द वह परेशान होकर हमारे माबूदों के सामने आ झुकेंगे और फिर क़ौम को कोई खतरा बाक़ी नहीं रहेगा ।
अबू सुफ़ियान ने कहा , यह मुनासिब है कि एक अहद नामा तैयार किया है हैं जाए और अहद नामा का मजमून यह हो कि मुसलमानों से उस वक्त तक बाईकाट किया जाए , जब तक वह इस्लाम से हटकर अपने बाप - दादा के हैं मजहब में फिर दाखिल न हों और इस अहद नामों पर तमाम लोग दस्तखत करें ।
उत्बा ने ताईद करते हुए कहा , बिल्कुल सही है और निहायत मुनासिब है ।
चूंकि सब इस राय से मुत्तफ़िक़ हो गये , इस लिए मंसूर बिन इक्रिमा हैं ने अह्द नामा लिखा । सब ने दस्तखत किये और इस अद नामा को काबे के दरवाजे पर लटका दिया । उस जमाने में यह तरीक़ा था कि जब समझौता लिखा जाता तो काबे के दरवाजे पर लटका दिया जाता था और जब तक वह तहरीर बाक़ी रहती , कोई अह्द के तोड़ने की जुरात न करता था ।
चुनांचे अह्दनामा लटका दिया गया , तो आस बिन वाइल सहमी ने कहा , आज ही मुसलमानों को ले जा कर पहाड़ी के किसी दरें में घेर दो । सब ने इस राय को पसन्द किया , चंकि उस वक्त तमाम असरदार लोग मौजूद थे , इस से अच्छा मौक़ा और कब मिल सकता था ? सब उठे और सीधे दारे अरक़म में जा पहुंचे । यहां मुसलमान जमा थे । वे अस्र की नमाज़ से फारिग हुए थे कि अबू जहल ने उन्हें क़ौम के मुत्तफ़िक़ा फैसले से खबरदार करते हुए कहा-
अगर तुम लोग मुहम्मद सल्ल० का साथ छोड़ दो तो तुम को आज़ादी दी जा सकती है । तमाम मुसलमानों ने एक जुबान होकर कहा , मर जाएंगे , मगर खुदा के प्यारे नबी सल्ल० का साथ न छोड़ेंगे ।
अबू जहल झुल्ला कर बोला , न छोडो , खुद ही दरें में तड़प कर मर जाओगे ।
अबू जहल ने कहा , तुम पर इतनी मेहरबानी की जाती है कि जो सामान इस वक्त तुम्हारे पास है , अपने साथ ले जा सकते हो , मगर इस के बाद फिर कोई सामान न मिल सकेगा ।
मुसलमान दारे अरकम से निकले , कि उस वक्त तक हुज़ूर सल्ल. ने कुपफ़ार से मुलाकात करने या लड़ने की इजाजत न दी थी , इसलिए खामोश अपने - अपने घरों को जाते रहे ।
जितना सामान था , अपने साथ लिया और शोथे अबी तालिब में चले गये ।
शोबे अबी तालिब एक पहाड़ी दर्रा था । यह दर्रा अबू तालिब के नाम से मशहूर था । चूकि हुजूर सल्ल० के सरपरस्त अबू तालिब थे , इसलिए वह मुसलमानों के साथ जाने पर मजबूर कर दिये गये ।
तमाम मुसलमान शोबे अबू तालिब में जाकर पनाह लेने वाले बन गए | अबु जहल ने कुछ लोगों को उन की निगरानी पर मुकर्रर कर के हिदायत कर दी कि कोई मुरालभान इस दरे से बाहर निकलने न पाये , न किसी आदमी को उन के पास जाने दिया जाए । इस तरह मुसलमान दरे में कैद कर दिए गए ।
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