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Thursday, April 4, 2019

HABASHA KI HIZRAT


( habsha ki hizrat ) हब्शा की हिजरत

कुफ्फ़ारे मक्का बिगड़ कर चले गये थे । उन्होंने जाते ही तमाम लोगों  को , जो उन के इन्तिजार में बैठे हुए थे , कह दिया कि मुहम्मद सल्ल०  तो  सुलह पर तैयार नहीं हैं । हम ने अबू तालिब के सामने हुज्जत पूरी कर ली हैं । अबू  तालिब से कह आए हैं कि मुहम्मद सल्ल० का साथ छोड़ दें ,  वरना उन के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी । हम उन्हें गौर करने के और गौर लिए कल तक की मोहलत दे आए हैं । अगर उन्होंने अपने भतीजे को हैं समझा दिया और वह हमारे माबूदो की मुखालफ़त से बाज आ गया , तो  ठीक है , वरना फिर मुहम्मद पर , मुसलमानों पर , दूसरे साथ देने वालों पर  इतनी सख्तियाँ करो कि उन के लिए जीना दूभर हो जाए । एलान कर दो कि मुहम्मद खाना ए काबा में न घुसने पाए , अपने जवानों से कह दो कि  जिस जगह मुहम्मद जाएं , बाजार हो या सड़क या गली - कूचा , हर जगह उन के पीछे जाएं , उन्हें किसी से बात न करने दें , शोर मचाएं , मुसलमान और  इस्लाम को बुरा कहें , मुसलमानों के खुदा को बुरा कहे ,  लड़कों को इस पर उभारो कि वे हर मुसलमान पर , मुहम्मद पर , मुसलमानों की हिमायत करने वालों पर घूल फेंके , ईटें मारे , पत्थर  बरसायें और उन्हें इतना तंग करें कि वे नये मज़हब को छोड़ दें और हमारे माबूदो को पूजने लगें ।

तमाम लोगों ने इस बात को पसन्द किया और इक़रार किया कि वे  ऐसा ही करेंगे ।
       
         कुछ देर बाद यह मज्लिस बर्खास्त हो गयी । लोग उठ - उठ कर अपने  घरों की ओर चले गये ।

 दूसरा दिन आया , लेकिन अबू तालिब का कोई जवाब न आया । यह  बात समझ ली गयी कि न मुहम्मद तब्लीग़ से बाज आएंगे , न अबू तालिब  उन का साथ छोड़ेंगे ।

         फिर क्या था , गुंडों , बदमाशों और आवारा जवानों की कई टोलियां  बन गयीं कि वे शहर के एक - एक हिस्से में मुसलमानों पर जुल्म ढाने का  काम शुरू कर दें ।

      हजरत जुबैर बाजार गये । गुंडे ताक में थे ही , उन के पीछे लग गये ।  लड़के भी साथ हो लिये । तालियां बजाने , ख़ाक उड़ाने और पत्थर मारने  लगे । हजरत जुबैर जवान थे , आप को गुस्सा आ गया । आप ने लड़कों को  डांट - डपट दिया । फिर क्या था , जो मवाद पक रहा था , वह फूट निकला  और आवारा , बदमाश  लोगों का जमघट आ लगा । सब ने हज़रत जुबैर  को बुरा - भला कहना और गालियां देनी शुरू कर दीं । हज़रत जुबैर मामले  की नज़ाकत समझ गये और चुप - चाप वापस चले आये ।

                                उस दिन तो नहीं , हां , दूसरे दिन मुसलमान खरीद व फ़रोख्त के लिए  अपने घरों से बाहर निकले , तो बदमाशों ने उन का पीछा करना शुरू  किया , उन्हें गालियां दो , उन पर खाक फेंकों , उनको पत्थर मारा और उन के कपड़ों को खींच - खींच कर फाड़ दिया ।

मुसलमानों को बुरा भी महसूस हुआ , लेकिन वे कमजोर थे , जानते थे   कि अगर जरा भी बोले तो मार खाएंगे , क़त्ल कर डाले जाएंगे । मजबूरन सबर किया और अपने - अपने घरों को लौट आए ।

              फिर यह सिलसिला गालियां देने , मार - पीट करने की हद तक न रहा ,  बल्कि बड़े - बड़े पत्थर रास्ते से उठा कर इन बदमाशों ने घरों में फेंकना  शुरू किया । गन्दगियां डालने लगे । मुसलमान सख्त परेशान हुए । उन का  घरों से निकलना बन्द हो गया ।

               हुजूर सल्ल० काबा शरीफ़ में नमाजें पढ़ा करते थे आप मकान से निकल  कर हरम शरीफ़ की तरफ़ चले । आवारा लड़कों और बदमाशों ने आप  को देख लिया ।  झुण्ड के झुण्ड आप के पीछे चले । लड़कों की तो हिम्मत  न हुई कि आप की शान में कोई गुस्ताखी कर सकें , हां , हरम शरीफ़ के  दरवाजे पर कुरैशी सरदारों को खड़ा पाया । जब दरवाजे में दाखिल होने हैं लगे , तो अबू  सुफ़ियान ने रोक दिया । अबू जहल ने कहा , मुहम्मद ! आज  से हरम शरीफ़ तुम्हारे लिए बन्द कर दिया गया है । तुम इस काबिल नहीं है  कि हमारे माबूदों की जियारत करो ।

       हुज़ूर सल्ल० ने फ़रमाया , अबू जहल ! तू दिन - ब - दिन गुमराही और शिर्क में  पक्का होता जाता है मैं खाना ए काबा में तुम्हारे झूठे माबूदों की जियारत करने  नहीं जाता बल्कि इसलिए जाता हु कि वह मक़ामे महमूद हैंहमारे और है तुम्हारे दादा हजरत इब्राहीम खालीलुल्लाह का बनाया हुआ मकान है खाना ए खुदा है , खुदा की नमाज पढ़ने जाता हु । किसी को भी यह हक़ नहीं कि  वह किसी को काबा  में दाखिल होने से रोके ।

           अबू जहल  हंसा और बोला , यह तमाम कुरेश के सरदारों की राय  हैं कि मुसलमानों को माना खाना ए काबा में दाखिल न होने दिया जाए । हरम शरीफ़ का दरवाज़ा हमेशा के लिए तमाम मुसलमानों पर बन्द कर दिया गया है । अब कोई मुसलमान दाखिल न हो सकेगा ।

 हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया , तो क्या मुझ खाना ए काबा  में दाखिल न होने देंगे ?

अबू जहल ने गुस्से में कहा , हरगिज़ नहीं ।

 हुजूर सल्ल० बोले , अगर मैं तुम्हारे रोकने से न रुकू ?

अबू सुफ़ियान भी उन सरदारों में मौजूद था , तलवार को म्यान से  खींच कर बोला , माबूदों  की क़सम ! यह तुम्हारे टुकड़े कर डालेगी ।

 हुज़ूर  सल्ल० ने दरवाजे की तरफ़ बढ़ते हुए कहा , अच्छा , तो तुम है तलवार चलाओ , खुदा मेरी मदद करेगा ।

        अबु जहल डरा कि हुजूर सल्ल० ज़रूर हरम में दाखिल हो जाएंगे । उस ने उस मज्मे की तरफ़ देखा , जो सामने खड़ा था और कुछ इशारा  किया ।

    फ़ौरन बदमाश बढ़ कर आए । उन्हों ने हुजूर सल्ल० को बुरा - भला  कहना और पीछे धकेलना शुरू किया । मजबूरन हुजूर सल्ल० को पीछे  लौटना पड़ा ।

                          उस दिन हरम का दरवाजा मुसलमानों के लिए बन्द कर दिया गया ।  अब कुफ्फ़ारे मक्का ने तमाम मुसलमानों पर इतना जुल्म करना शुरू कर दिया कि उनका अपने घरों से बाहर निकलना , कारोबार करना जिंदगी की जरूरतों की चीजों को खरीदना - बेचना मुश्किल हो गया । जब  खाने वगैरह का सामान ही न आता , खाना कहां से मिलता है । लोग भूखे  रहने लगे । आप को इस से बड़ी चिन्ता हुई , इस लिए आप ने सोचना  शुरू कर दिया कि अब क्या किया जाए ।

 इधर जोशीले मुसलमान कुफ्फार का मुकाबला करने के लिए  हुज़ूर सल्ल० से इजाजत तलब करने लगे । हुज़ूर सल्ल० ने फ़रमाया , मैं लडाई की इजाजत बगैर खुदा के हुक्म के नहीं दे सकता । सबर व शुक्र कर के  सख्तियो  को बर्दाश्त करो । अभी सुदा तो हमारी आजमाइश कर रहा है । हम  को इस आजमाइश में पूरा उतरना चाहिए ।

 लोग खामोश हो गये ।

 हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद एक सहाबी थे । आप निहायत जोशीले  थे । आप ने जब सुना कि मुसलमानों को हरमे मोहतरम में कुरआन  शरीफ़ की तिलावत ऊची आवाज़ से करने और नमाज़ पढ़ने से रोक दिया  गया है , तो आप को जोश आ गया । आपने फ़रमाया कि हरमे मोहतरम्  में जा कर खुदा का कलाम पढ्गा  ।

                                      मुसलमानों ने समझाया कि कुफ्फार दुश्मनी पर आमादा हैं कि वे मुसलमानों को खत्म करने की प्लानिंग कर रहे हैं । तुम्हारा हरमे मोहतरम में जाकर कुरआन शरीफ़ ऊची आवाज से पढ़ना गवारा न कर सकेंगे ,  यक़ीनन मार डालेंगे , इस लिए अभी खामोश रहो । जब खुदा का हुक्म  होगा , तुम ही क्या सब खाना काबा में जाकर ऊची आवाज में कुरआन शरीफ़ पढेगे ।

            हजरत अब्दुल्लाह ने कहा , मेरा दिल नहीं मानता कि कुफ्फ़ारे मक्का  हरम में जाकर बुतों की पूजा करें , हम वहां कुरआन शरीफ़ भी न पढ़ सकें  परवाह नहीं कि अगर वे मुझे मार डालेंगे , मैं जरूर आज ही वहां जा कर है कुरआन शरीफ़ पढ़गा ।

 मुसलमानों को बड़ी चिन्ता हुई । जानते थे कि जिस वक्त अब्दुल्लाह  कुरआन शरीफ़ की तिलावत करेंगे । फ़ौरन ही कफ्फ़ार उन को कत्ल कर डालेंगे ।

 मुसलमानों में इस्लाम ने मुहब्बत पैदा कर दी थी । सब ने समझाया ,  अब्दुल्लाह चुप हो गये । मुसलमानों ने समझ लिया कि वे अपने इरादे से  बाज़ आ गये हैं , इसलिए किसी ने उन की निगरानी न की , पर अब्दुल्लाह  मौके की घात में रहे और मौका मिलते ही सीघे हरम शरीफ़ पहंचे , कुफ्फार  ने  उन को रोका , पर बावजूद इस रुकावट के वह मक़ामे इब्राहीम पर जाकर  खड़े हो गए और बड़ी अच्छी आवाज़ से सूरः रहमान की तिलावत करने में है लगे ।


कुफ्फारे  मक्का ने जब रहमान का नाम सुना , तो बहुत बिगड़े और जब यह सुना कि सितारे और पेड़ उसको सज्दा करते हैं , तो उसे थे माबूदों है की तौहीन समझ , उनके ख्याल में उनके माबूद ही उस सज्दे के काविल थे।

  वे बिगड़ गये । सब के सब हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद के ऊपर  बरस पड़े और घूसे , लात और मुंह पर तमांचे मारने लगे , लेकिन अब्दुल्लाह ने उन की मार का ख्याल भी न किया  पिटते रहे ।

               कुपफ़ारे मक्का को इस पर बड़ा तैश आया । उन्होंने आप का मुह  नोच लिया । आप के गालों पर इतने घुसे लगाये कि आप का चेहरा लहू - लुहान हो गया ।

 हज़रत अब्दुल्लाह जब सूरः रहमान खत्म कर चुके , तब लौटे , मगर  किस शान से कि आप के तमाम कपड़े फाड़ डाले गये थे , चेहरा लहुलुहान  कर दिया गया था । आप ने मकान पर पहुंच कर कपड़े बदले , मुह धोया , घावों पर मरहम लगाया और चुपचाप बैठ गये ।

कुफ्फ़ारे कुरेश  ने लोगों से यह भी कह दिया था कि जो आदमी ऊंची आवाज से कुरआन पढे , उसे मारो । अगर कोई उसे घर पर पढ़ता हो , तो उस के घर में घुस जाओ और उसे उस वक्त तक मारो , जब तक वह कुरआन शरीफ़ पढ़ना न बन्द कर दे ।

         काफ़िरों ने इस पर सख्ती से अमल करना शुरू कर दिया । वे मुसलमानों के घरों के पास इसी घात में खड़े हो जाते थे कि जब वे ऊंची आवाज से है क़रआन शरीफ़ पढ़े , तो फ़ौरन उन के घरों में घुस कर उन्हें मारें और लुट ले ।

हज़रत अबूबक्र कुरैश के रईसों में से थे । बड़े आदमी थे  जब वह मुसलमान हुए तो उनके पास चालीस हजार दिरहम नक़द मौजूद थे । बहुत  से खादिम , गुलाम , लौंडियां थीं , लेकिन कुफ्फ़ार के डर से वे भी कुरआन  मजीद ज़ोर से न पढ़ते थे ।

 इस तरह मुसलमानों का माल , इज्जत - आबरू , जान सब खतरे में था ।  अब सही मानो में उन की जिंदगी तंग कर दी गयी थी । भूखे - प्यासे छिपे  अपने घरों में बैठे रहते थे ।

 हुजूर सल्ल० ने यह कैफियत देख कर हब्शा को हिजरत करने का  हुक्म दिया । मुसलमान इस हुक्म से बहुत खुश हुए ।

      उस जमाने में हब्शा का बादशाह  ईसाई था । उस का नाम सहमा  था । अरब  उसे नजाशी कहते थे ।

 चूंकि मुसलमान जानते थे कि कुफ्फ़ारे मक्का उन्हें आसानी से हिजरत  न करने देंगे , जरूर रोकेंगे । इस  लिए उन्हों ने चुपके - चुपके तैयारी शुरू  की । जब तैयारी पूरी हो गयी , तो एक दिन - रात को जब कुपफ़ार सो रहे ।  थे , चुपके से मक्का से निकले और जद्दा की तरफ रवाना हुए ।

 माह रजब सन् ०५ नबवी  में यह छोटा सा क़ाफ़िला घर - बार , वतन ,  रिश्तेदारों और दोस्तों को छोड़ कर रवाना हुआ । इस छोटे - से क़ाफ़िले  में सिर्फ बारह मर्द और चार  औरतें थीं । मदों में हजरत उस्मान बिन अफ्फान , हजरत जुबेर  बिन अब्वाम , हजरत अब्दुल्लाह बिन मस्ऊदहज़रत हुजैफ़ा बिन उत्बा , मुसअब बिन उमेर , हजरत अब्दुल्लाह बिन ओफ़ , हज़रत अब सलमा मरज़ूमि , हजरत उस्मान बिन मजऊन , हज़रत आमिर बिन रबीआ , हजरत अबू  हरैरह तालिब विन उमर , हज़रत सुहेल  विन औजार थे । औरतों में हजरत रुक्कैया , हजर सल्ल० की साहबजादी हजरत उस्मान बिन अफ्फ़ान की बीवी , हजरत सहला , हज़रत उम्म सलमा , हुज़रत लैला थीं ।

 यह मुहाजिरों का पहला क़ाफ़िला था जो हिजरत कर के हब्शय की तरफ़ चला ।

https://alameainah.blogspot.com/2019/04/darabaar.html

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