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Tuesday, April 16, 2019

Hazarat Omar became a Muslim

हज़रत उमर मुसलमान हो गए

हजरत उमर कुरैश की नस्ल से थे , जो आठवीं पीढ़ी में हुजूर सल्ल.  से मिल जाता है । बड़े बहादुर और जोशीले थे । वह नवजवान थे , उन की  उम्र २७ वर्ष की थी । गुस्सा भी उन्हें था । तमाम अरब में वह ' अरब के  शेर के नाम से मशहूर थे । आप अच्छी तरह से लिखना - पढ़ना नहीं जानते  थे । अरबी जुबान के माहिर थे । आप बहादुर भी थे और निडर भो । जब  और जिस से उलझ जाते थे , वही दब जाए , तो जाए पर आप न दबते थे ।

तमाम अरब जानता था कि उमर जब मयान  से तलवार निकाल लेते हैं , तो वह अपना काम कर के ही वापस म्यान में आती है । आपने तलवार  म्यान से निकाल कर हुजूर सल्ल० को कत्ल करने का इरादा किया था ।  इसलिए सब समझ रहे थे कि उमर की तलवार मुहम्मद ( सल्ल० ) का ? काम तमाम कर के ही म्यान में वापस जाएगी ।

 इस ख्याल से लोगों को बड़ी खुशी हुई । कुछ ही लम्हे में मक्का में यह खबर बिजली  की तरह फैल गयी कि उमर हुजूर सल्ल० को क़तल करने के  लिए चल चुके हैं ।

उमर बड़ी शान से झूमते - झामते हाथ में नंगी तलवार लिए चले जा रहे थे  । जब वह बाजार के आखिरी सिरे पर पहुंचे , तो उन के सामने से व साद बिन अबी वफ़ास आते हुए मिले । हजरत साद मुसलमान हो चुके थे उमर के हाथ में नगी तलवार देख कर वह ठिठके । उमर को रोकते हुए कहा , हाथ में नंगी तलवार कहां लिए जा रहे हैं?

मुहम्मद को क़त्ल करने । उस ने क़ौम में बड़ा फितना  पैदा कर दिया है । आज उस का खात्मा कर के आऊंगा । उमर ने कहा ।

हजरत साद यह सुन कर बड़े परेशान हुए , बोले , हुजूर सल्ल० को क़तल  कर के तुझे क्या मिलेगा ?

 उमर ने गुस्से में कहा , क्या तू भी मुसलमान हो गया है ?

हां , मैं भी मुसलमान हो गया हूँ । साद ने कहा ।

फिर आगे फ़रमाया , पहले अपने घर की खबर लो , तो  हुजूर सल्ल०  को बाद में कत्ल करना ।

उमर  ने पूछा , घर की क्या खबर लु ?

 तुम्हारी बहन फातमा और तुम्हारे बहनोई सईद बिन जैद भी मुसलमान हो चुके हैं ।

यह सुन कर उमर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया ।

 उन्हों ने जोश भरी आवाज़ में कहा , अगर यह बात है , तो पहले इन दोनों का खात्मा कर आऊं ।

इतना कह कर वह अपने बहनोई के मकान की तरफ़ पलटे ।

 हज़रत साद भी यही चाहते थे कि किसी न किसी तरह उन्हें इतना हैं मौका मिल जाये कि वह हुजूर सल्ल० को इस की इत्तिला करा दें । उमर  के पलटते ही वह पलटे और जल्दी से कदम उठा कर वह , अरक़म के  मकान की तरफ चल पड़े । उस वक्त हुजूर सल्ल० नहीं थे ।

 उमर जोश में भरे हुए हज़रत सईद के मकान पर पहुंचे । दरवाजा  बन्द था और किसी के पढ़ने की आवाज़ आ रही थी । आप दरवाजे से लग  कर खड़े हो गये और कान लगाकर सुनने लगे । धीमी आवाज़ की वजह से पूरा न सुन सके , लेकिन इतना अन्दाज़ा हो गया कि शायद कोई कुरआन मज़ीद  पढ़ रहा है ।

 उमर का गुस्सा बढ़ गया , दरवाजा शोर से खटखटाया । दरवाजा खुला और आपकी बहन फातमा दरवाजे पर खड़ी नज़र आयीं ।

भाई जान ! आप हैं ? आ जाइए । हजरत फातमा ने कहा ।

 उमर गुस्से में भरे हुए मकान के अन्दर दाखिल हुए । सामने ही  चटाई पर आप के बहनोई हजरत सईद बैठे थे । वह उमर का भरा चेहरा देखकर सहम गए । डरते - डरते अदब के तौर पर खड़े हो गए । उमर ने बढ़कर तलवार चटाई पर रख दी और हजरत सईद से पूछा बताओ  तुम क्या पढ़ रहे थे ?

उमर  इस तरह खड़े थे , गोया हजरत सईद पर झपटने वाले हैं ।

उन की बहन फ़ातमा यह देख कर समझ गयीं कि उमर को उन के  मुसलमान होने का इल्म हो चुका है । चूंकि उमर बड़े जोशीले हैं , जरूर   सईद रजि० को मारे - पीटेंगे , साथ ही उन को यह भी मालूम था कि हज़रत  लुबनिया , उन की बांदी मुसलमान हो गयी  और वह उन्हें इस कदर मारते हैं कि मारते - मारते थक जाते हैं , इस लिए वह डर गयीं और उन्होंने  फ़रमाया

      भाई जान ! तश्रीफ़ रखिये । हम जो पढ़ रहे थे , आप को सुना देंगे । उमर गुस्से में भरे हुए थे । उन्हों ने हज़रत फातमा को झटका देकर  अलग कर दिया और हजरत सईद का दामन पकड़ कर उन्हें झटक देते हुए कहा , ओ गुमराह ! तु क्या पढ़ रहा था ?


 हजरत सईद डरी हुई निगाहों से उन्हें देखने लगे । कुछ जवाब न  दिया ।

उमर को इतना गुस्सा आया कि उन्हों ने हज़रत सईद को नीचे गिरा  दिया । मारना शुरू किया , मारते जाते थे और कहते जाते थे कि कमबख्त !  तुम मुसलमान हो गये हो । अब मुसलमान होने का मज़ा चखो ।


 हज़रत सईद रजि० ने कोई जवाब न दिया । खामोश पड़े पिटते रहे । उमर ने कहा , जलील , कमीने , तुम ने इस्लाम कुबूल कर के हमारे  खानदान को बट्टा लगा दिया है । बोल , क्या तू इस्लाम छोड़ेगा ?

 हज़रत सईद ने कहा , नहीं , नहीं , मरते दम तक इस्लाम का दामन हाथ  से न छोडूंगा ।

 यह जवाब सुन कर उमर पहले से भी ज्यादा ग़ज़बनाक  हो कर  बिफरे , आपे से बाहर हो गये । उन्हों ने और ज्यादा मारना शुरू कर  दिया ।

 अब हज़रत फातमा से सब्र न हो सका ।

उन्हों ने उमर का हाथ पकड़ते हुए कहा , भाईजान ! बस करो ।

आखिर कब तक मारोगे ?

 उमर तो गुस्से में भरे ही थे । आप ने जोर से एक घुसा मारा । फ़ातमा  सर दीवार से टकरा गया , फटा और खून बह कर चेहरे पर फैलने  लगा ।

हजरत फातमा रजि० ने जोश में भर कर कहा , हां ऐ उमर ! हम  मुस्लमान  हो चुके हैं , मुहम्मद सल्ल० के फ़रमांबरदार बन गये हैं , जो तुम  से हो सके , करो ।

 उमर ने फ़ातमा का खून में सना चेहरा देखा , तो आप का गुस्सा धीमा हैं पड़ गया । आप ने हजरत सईद रजि० को छोड़ दिया । उठे और बहन से  बोले , मुझे वह कलाम लाकर दिखाओ या सुनायो , जो तुम अभी - अभी पढ़ रहे थे ।

 उमर ने यह बात संजीदगी से कही थी , हज़रत फ़ातमा ने चेहरे से ही हैं भांप लिया था , इसलिए उन्हों ने थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए कहा -

 ऐ भाई । हम कुरआन पढ़ रहे थे । कुरआन के बारे में अल्लाह ने है फ़रमाया है कि इस को वही छू सकते हैं , जो पाक हैं । अगर आप नहा कर  आए हैं , तो हम आप को पढ़ कर सुना सकते हैं , इस में शक नहीं कि यह  खुदा का हुक्म है ।

 इस कहने का मक्सद यह था कि उमर नहा लें , ताकि उन्हें जो थोड़ा हैं बहुत गुस्सा रह गया है , वह भी जाता रहे ।

 उमर को कुरआन मजीद सुनने का बहुत शौक़ था । उन्हों ने कहा , अच्छा , मैं गुस्ल कर के आता हूँ ।

 यह कहते ही वह बाहर चले गये ।

 एक अरब मकान के अन्दर छिपे हुए थे । यह खब्बाब बिन अरत्त थे । क़ुरआन मजीद की तालीम देने के लिए हज़रत सईद रजि० के पास आते,  उमर को देख कर छिप गये थे । उन्हों ने हजरत फातमा को खिताब कर के कहा , फ़ातमा ! तुमने यह क्या ग़ज़ब किया कि अपने भाई को क़रआनी आयतों के दिखाने का वायदा कर लिया ।

 हजरत फ़ातमा ने कहा , इत्मीनान रखो खब्बाब ! मुझे यकीन है कि  कलामे इलाही उमर के दिल पर असर किये बगैर न रहेगा ।

खब्बाब ने कहा , खुदा ऐसा की करे ।

अब हजरत सईद रजि० भी उठ कर खड़े हो गये थे ।  उन्हों ने कहा मेरा दिल गवाही देता है कि उमर मुसलमान हो  जाएंगे ।

हज़रत खम्बाब रजि० ने कहा , खुदा करे , ऐसा ही हो । उमर के मुसलमान होने से इस्लाम और मुसलमानों को बड़ी ताक़त मिलेगी ।

हजरत फातमा  रजि० के जख्म से खून अब तक जारी था ।

 हजरत सईद ने कहा , तुम अपना सर और मुह धो डालो ।

 फातमा ने मुह - हाथ धोया , जख्म पर पट्टी बांधी ।

इस बीच उमर नहा - धो कर आ गये ।

 उन्हों ने आते ही कहा , अब दिखाओ , तुम क्या पढ़ रहे थे ?

  उमर को आते हुए देख कर खब्बाब फिर घर के अन्दर जा छिपे ।

हजरत फातमा अन्दर से कुछ पन्ने लायौं । इन पर सूरः हदीद  लिखी  हुई थी ।

उमर ने हज़रत फातमा से वे पन्ने लेकर खुद ही पढ़ना शुरू कर दिया था-

"जमीन व आसमान के रहने वाले खुदा की तस्बीह करते हैं और खदा 8 ही ग़ालिब और हिक्मत वाला है । वह आसमानों और जमीन का बादशाह है । वही जिदा करता है , मारता है और हर चीज पर कुदरत रखता है ।

 उमर ने अभी इतना ही पढ़ा था कि बोल उठे , वाह ! क्या मीठा कलाम है । ऐसा कलाम आज तक न मैं ने देखा , न सुना । इस का असर सीधे दिल पर होता है ।

आप ने पढ़ना शुरू किया । ज्यों - ज्यों आप पढ़ते जाते थे , दिल मुतास्सिर  होता चला गया । जब आप ने यह आयत पढ़ी - - ‘ खुदा और उस के रसूल  पर ईमान ले आओ और खर्च करो उस चीज को , जिसे तुम्हें पहले लोगों  का जानशीन कर के दिया गया है । पस जो लोग ईमान लाये , उनके लिए  बड़ा सवाब है ।

 इन आयतों ना उमर पर बड़ा असर पड़ा और वह बे - अख्तियार  पुकार उठे , यह कलाम वहुत उम्दा है । मैं ईमान लाया इस पर ।

उमर को इस तब्दीली से हजरत सईद , फ़ातमा दोनों बहुत खुश हुए ।  हज़रत खव्वाब भी खुश हो कर बाहर निकल आए । उन्हों ने आते ही उन  को सलाम किया ।

हज़रत खब्बाब  ने कहा , मैं आप के बहनोई और बहन को कुरआन  मजीद की तालीम देने आया करता था । आप  को देख कर छिप गया था ।  ऐ ख़त्ताव के बेटे ! मुबारक हो । मुहम्मद सल्ल० की दुआ आप के हक़ में हैं मक्बूल हुई ।

 कैसी दुआ ! हज़रत उमर ने पूछा ।

हुज़ूर  सल्ल० ने कल दुआ फरमायी थी , इलाही ।   उमर को मुस्लमान कर दे या अबू जहल को ।  मालूम होता है । तुम्हारे हक में  दुआ मकबूल हो गयी ।

 हजरत उमर ने फ़रमाया , अब मुझे हुज़ूर  के पास ले चलो । मैं वही  चल कर मुसलमान हूंगा ।

चुनांचे हजरत सईद , हजरत फातमा , हजरत ख्वाब रजि० उन्हें साथ  ले कर रवाना हुए । हजरत उमर ने तलवार हाथ में ले ली । उधर हजरत साद बिन अबी वक्कास आप की खिदमत में हाजिर होकर हजरत उमर के  आने की कैफ़ियत बयान कर चुके थे । कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई । लोगों ने दरवाजे से झांक  कर देखा , हजरत उमर नंगी तलवार लिए  खड़े नजर आए ।

 सहाबा रजि० ने हुजूर सल्ल० से जिक्र किया हुजुर सल्ल० ने हम है दिया कि दरवाजा खोल दो ।

 हज़रत अमीर हमजा भी मौजूद थे । उन्हों ने भी फरमाया , बेशक  दरवाजा खोल दो । अगर उमर नेक इरादे से आया है , तो खैर , वरना इसी  तलवार से उस का सर उड़ा दिया जाएगा ।

 चुनांचे सहाबा किराम ने क़रीब जा कर दरवाजा खोला । हजरत  उमर मकान के अन्दर दाखिल हुए । जब वह हज़र सल्ल० के करीब पहुंचे तो आप उठ खड़े हुए । आप के साथ तमाम सहाबी भी उठ खड़े हुए ।

 जलाल भरी आवाज़ में हुजूर सल्ल० ने पूछा , उमर । किस इरादे से  आए हो ?

 इस रोवदार आवाज ने हजरत उमर को कपकपा दिया ।

  उन्होंने कहा , ऐ खुदा के मोहतरम रसूल ! मैं मुसलमान होने आया हूं ।

हुजूर सल्ल० ने खुशी में पूरी आवाज से अल्लाह अकबर का नारा बुलन्द किया । दारे अरक़म और मुहल्ले की तमाम पहाड़िया गुंज  उठीं । 

 हुजूर सल्ल० उसी जगह बैठ गये । तमाम सहाबा  रजि० आप  के चारों हए । ६ ओर बैठ गये और हजरत उमर सामने बैठ गये । हुजूर सल्ल०  ने कलिमा  पढ़ा कर हज़रत उमर को मुसलमान किया ।

 हज़रत उमर ने इस्लाम कुबूल करने के बाद कहा , ऐ खुदा के हबीब !

मैं चाहता हूं कि आज खाना काबा में चल कर नमाज अदा कीजिए ।

हुजूर सल्ल० ने फ़रमाया , अगर तुम्हारा यही इरादा है , तो चलो ।

सब उठ खड़े हुए । दारे अरक़म से बाहर आए और खाना काबा की  तरफ रवाना हुए ।



हज़रत उमर सब से आगे नंगी तलवार लिए चल रहे थे । हुजूर सल्ल० के सीधे हाथ पर हजरत अबू बक्र और उलटे हाथ पर हमज़ा और उन के बराबर हजरत अली चल रहे थे । बाक़ी सहाबा के पीछे थे  ।

 कुफ्फ़ारे मक्का ने जब इस शान से मुसलमानों को आते देखा , तो उन  को बड़ी हैरत हुई । रास्ते में अबू जहल  मिला , उसे देखते ही हजर  उमर रज़ि० ने कहा-

 अबू जहल  ! खुदा का शुक्र है कि मैं मुसलमान हो गया हूं । मुहम्मद  सल्ल० को खुदा का रसूल मानता हूँ । 

अबू जहल  को कुछ कहने का हौसला न हुआ और मुसलमानों ने खान  काबा में नमाज़ पढ़ी , कुफ्फ़ारे मक्का एक ओर खड़े रहे ।  यह पहली नमाज थी , जो मुसलमानों ने एलानिया खाना काबा में  पढ़ी । नमाज़ पढ़ कर लोग वापस आ गये । हज़रत उमर की वजह से  किसी काफ़िर को कुछ कहने की हिम्मत न हुई ।

यह वाक़िआ जिलहिज्जा सन ०६ नबवी का है ।

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