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Saturday, April 6, 2019

DARABAAR

 

DARABAAR(दरबार)

सुबह के वक्त मक्का के कुफ्फ़ार को मालूम हुआ कि कुछ मुसलमान  हिजरत कर के हब्शा की ओर चले गये हैं । यह एक नयी बात थी । इस  से मक्का के काफ़िरों में हलचल मच गयी । उन्हें ख्याल हुआ कि मुसलमान  हब्शा में जा कर हमारे माबूदों की बुराइयां बयान करेंगे । इस से उन के  मजहब की बेहद तोहीन होगी ,

             वे सब लोग एक जगह जमा हुए और अगले प्रोग्राम पर मश्विरा करना  शुरू किया ।

 तैय  हुआ कि साठ - सत्तर बहादुर जवानों को मुहाजिरों का पीछा करने से के लिए रवाना किया जाए । अगर मुहाजिर वापस आने पर तैयार हो  जाएं , तो ठीक है , वरना सब को क़त्ल कर डाला जाए ।

        सत्तर आदमी भेज दिये गये । ये लोग ऊंटों पर सवार होकर तेजी से  चले । लेकिन जब  जद्दा पहुंचे , तो मालूम हुआ कि अब हब्शा जाने वाला कोई जहाज नहीं है । जो जहाज़ बन्दरगाह पर खड़ा था वह मुहाजिरों को ले कर जा चुका है ।

       कुपफ़ारे मक्का को बड़ा  गुस्सा आया , पर वे कर ही क्या सकते थे ? मुहाजिर उन की पकड़ से बाहर हो गये थे । यह गुस्सा अब उन मुसलमानों पर और ज्यादा निकलने लगा , जो मक्के में मौजूद थे । उन्हों ने अब उन की जबरदस्त निगरानी शुरू कर दी और उन पर जुल्म की चक्की भी  तेज़ चला दी ।

         दर्द भरे मज़ालिम से मुसलमान इतने तंग आ गये कि उन का मक्का मुकरंमा में सांस लेना दूभर हो गया , इस लिए तंग आ कर चुपके - चुपके उन्होंने भी खुफ़िया तौर पर हिजरत शुरू कर दी । दो - दो , चार - चार करके रोज़ाना रात को छिप कर निकल जाते और जद्दा में पहुंच कर जहाजों के इंतिज़ार में छिपे रहते और जब कोई जहाज़ जाने लगता , उस पर बैठ  कर हब्शा रवाना हो जाते ।

कुफ्फारे मक्का के जुल्मों से तंग आ कर हजरत जाफ़र तयार बिन अबू तालिब ने भी हिजरत की और वह भी अपने मुसलमान भाइयों के  पास हब्शा पहुंच गये । इस तरह सत्तर - अस्सी मुसलमान हिजरत कर के हब्शा में जा पहुंचे और वे निहायत इत्मीनान से जिंदगी बसर करने लगे ।


                        दुश्मनों को जब मालूम हुआ कि मुसलमान हब्शा में खुशहाली की  जिंदगी जी रहे हैं , तो उन के सीने पर सांप लोट गया , उन्होंने मज्लिसे शुरा बुलायी । सभी बड़े लोग जमा हो गये ।

         जोरदार तकरीरें हुई । इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ़ ज़हर  उगला गया ।

आखिर में यह बात ते पायी कि नजाशी के हुजूर में कीमती तोहफ़े ले कर वफद  हाजिर हो , जो बादशाह के दरबारियों को हमवार कर के मुसलंमानों की वापसी की मांग कराये ।

        मक्का के कुरैश और हब्शा के बादशाह  नजाशी के बीच पहले तिजारती ताल्लुक़ात थे । इस लिए उन्हें पूरा यकीन था कि हब्शा का शाह इन  बेकस व बेचारे मुसलमानों को उन के वफद  के साथ भेज देगा । वफ्द  तयार किया गया ।अम्र बिन  आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को वफद   का सरदार बनाया गया और क़ीमती तोहफे और सामान दे कर उन्हें  रवाना कर दिया गया ।

      यह वफद  बड़ी शान के साथ जद्दा की ओर रवाना हुआ । जद्दा से जहाज़ में बैठ कर हब्शा जा पहुंचा । चूंकि शानदार वफ्द था , इस लिए पूरे हब्शा को इस की खबर हो गयी । मज़लूम मुसलमानों को मालूम  हुआ तो वह घबरा गये और उन्हें डर हुआ कि कहीं नजाशी उन को वपस  जाने पर मजबूर न करे ।

    उन्हों ने तै कर लिया कि हब्शा के बादशाह ने अगर हमें वफ्द के सुपुर्द  किया , तो हम किसी और तरफ़ निकल जाएंगे , लेकिन मक्का वापस न  जाएंगे ।

         कुरैश के वफद ने दरबारियों को तोहफ़े - तहाइफ़ देकर इस बात पर हैं तैयार कर लिया कि देश छोड़ कर आने वाले मुसलमानों को वापस मक्का जाने पर आमादा करें । उन्हों ने वायदा भी कर लिया । इस तरह नजाशी हैं के दरबार में वफ्द की पहुंच हो गयी । नजाशी ने शानदार तरीके से है दरवार सजाया ।

जब वफद दरबार में पहुंचा तो दरबार की सजावट देख कर हैरान रह  गया । अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ ने बड़े अदब से झुक  कर सलाम किया । उन के तमाम साथी जो  के साथ थे , नजाशी के सलाम के लिए झुक गये । सलाम कर के तो पेश किये ।

         नजाशी ने पूछा , अरबो ! तुम मेरे दरबार में किस लिए आये हो ? हैं और क्या चाहते हो ?

 अम्र बिन आस ने कहा , हमारी क़ौम ने एक जुट हो कर हमें आप के  हुजूर में इस लिए भेजा है कि हुजूर से अर्ज करें कि हमारे शहर में एक जादूगर पैदा हुआ है , उस का नाम मुहम्मद है । उस ने एक नया मज़हब  ईजाद किया है , ऐसा मजहब , जो किसी और मज़हब से मेल नहीं खाता , हैं बिल्कुल नया मज़हब । हमारे शहर के कुछ नादान लोगों ने इसे कुबूल है कर लिया है । हम ने जब इन पर जोर दिया कि इस नये मज़हब को छोड़ दें , तो वे बेवकूफ़ वहां से भाग कर हुजूर की हुकूमत में आ गये हैं । हम हैं उन को वापस ले जाने के लिए हुजूर के दरबार में हाज़िर हुए हैं ।

     नजाशी को उन की बातों को सुन कर बड़ा ताज्जुब हुआ और उस ने  है कहा , नया मजहब ईजाद किया है , लोग जादू के शिकार हो गये हैं । यह  समझ में आने वाली बात नहीं है ।

 अम्र बिन आस ने कहा , जनाब ! हम को खुद अफ़सोस है । मुहम्मद है ऐसा जादूगर है । जो उस से एक बार बात कर लेता है , वह उस का  आशिक हो जाता है । उस ने हमारी क़ौम में एक नया फ़िटना पैदा कर  दिया है , नया मजहब ईजाद किया है । हुजूर उन लोगों को बुला कर हैं मालूम कर लें ।

           नजाशी ने कहा , मैं ज़रूर बुलाऊंगा । मुझे उन के देखने का शौक़ है । वे अपने आप को क्या बतलाते हैं?

    अम्र बोला , वे खुद को मुसलमान कहते है । भला मुसलमान भी । किसी मज़हब का नाम हो सकता है ?

      अब वजीरे आज़म उठा , यह बूढ़ा आदमी था । उस ने कहा , हजर ! ये मुसलमान नये मज़हब के मानने वाले हैं । मैं इन से मिल चुका हु  । वे अजीब अक़ीदा रखते हैं , न यहूदी , न ईसाई , न बुतपरस्त । मुझे डर है  हैं कि वे कहीं अपने नये मजहब की तब्लीग मुल्क हब्शा में न कर दें । इसलिए  मेरे ख्याल में उन तमाम लोगों को इस वपद के साथ रवाना कर दीजिए और अपने मुल्क और अपनी क़ौम को उन की शरारतों से बचाइये ।

 नजाशी ने कहा , अभी कुछ नहीं कहा जा सकता । अच्छा मुसलमानों में  को बुलाओ ।

    वजीर ने करनल की तरफ़ इशारा किया । वह दरबार से बाहर आया , कुछ सिपाहियों को साथ लिया और मुसलमानों की ओर चल पड़ा । मुसलमानों को पहले ही डर था । वह सहम रहे थे कि अब क्या होता है । मक्का है में उन पर इतनी सख्तियां हुई थीं कि वे वहां जाने पर मौत को तर्जीह  देते थे । उन्हों ने आपस में तै कर लिया था कि मर जाएंगे , मगर यहां है हरगिज़ न जाएंगे ।

            जब ईसाई सिपहसालार उन की तलबी के विए आया , तो सब लोग है उस के दरबार में पहुंचे , सब ने बादशाह को सलाम किया । नजाशी ने हैं उन को बैठने के लिए कुसियां डलवायीं ।  

     जब सब बैठ गये , तो नजाशी ने पूछा , क्या तुम ने कोई नया मज़हब  ईजाद किया है , जो ईसाइयत और बुतपरस्ती दोनों के खिलाफ़ है ?

         हजरत जाफ़र जवाब देने के लिए खड़े हुए । 

 आप ने फ़रमाया , ऐ बादशाह ! ऐ लोगो ! हम लोग जाहिल थे , बुतपरस्त थे , बुतों को पूजते थे , मुरदार खाते थे , हराम - हलाल की कोई  तमीज़ न थी , बदकारियां करते थे , पड़ोसियों को सताते थे , भाई - भाई पर  जुल्म करते थे और हर मज़बूत हर कमज़ोर को पीस डालता था , गोया  दुनिया भर के एब हम में थे । खुदा ने हम पर रहम किया और अपने  प्यारे नबी को हम पर भेजा । उस नबी  की शराफ़त , दयानत और सदाक़त  को हम खूब जानते थे । उसने हम को इस्लाम की दावत दी । हमें सिखाया कि हम पत्थरों को पूजना छोड़ दें , हमेशा सच बोले , खुरेजी न करें , यतीमों । । का माल न खाएं , पड़ोसियों को आराम दें । नमाज़ पढे , रोजे रखें , जकात  दें । हम ने उस की दावत मानी , खुदा पर ईमान लाये , शरारत और बुतपरस्ती छोड़ दी , बदकारियों से तौबा की । इस जुर्म में हमारी कौम हमारी है दुश्मन हो गयी और हम पर सख्तियां करने लगी । हम पर ऐसे - ऐसे जुल्म  किये गये , जिन को सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । हमें मजबूर किया  गया कि हम फिर तबाही के गढ़ में गिर पड़े । हमने तंग आ कर पनाह ली । है अब ये हम पर फिर जुल्म व सितम करने के लिये यहां से ले जाना चाहते ।


    नजाशी और तमाम दरबारी पूरी तवज्जोह से हज़रत जाफ़र की बाते  सुनते रहे । जब खामोश हुए तो नजाशी ने कहा , जो बातें तुम ने बयान  की हैं , वे तो कुछ बुरी नहीं ।

 हज़रत जाफ़र ने कहा , आप इन से पूछिए कि क्या हम इन के गुलाम है ?

 अब मुसलमानों की बात नजाशी के वास्ते से अम्र बिन आस से शुरू हुई ?

अम्र ने जवाब दिया , इस में से एक भी गुलाम नहीं है , सब के सब  आजाद हैं ।

हज़रत जाफ़र ने फिर पूछा , हम में से किसी ने किसी का खून किया है ?
तुम्हारा दामन इस इल्जाम से भी पाक है । जवाब  मिला  ।
हम में से किसी ने किसी का माल चुराया है ?
नहीं ।

 हम में से कोई आप का या आप की कौम के किसी आदमी का क़र्ज खाये हुए है ?

यह बात भी नहीं है ।

 क्या तुम्हारी दिली मंशा यह नहीं है कि हम तुम्हारे मजहब में लौट आएं ?

बेशक , हम यही चाहते हैं ।

क्या तुम बुतों को नहीं पूजते हो ?

हमारे बाप - दादा का मज़हब यही हैं । तुम्हारे बाप - दादों का भी  यही मजहब था , अब तुम ने नया दीन अपना लिया है ।

जब नजाशी ने देखा कि बात बढ़ती जा रही है , तो दोनों को खामोश में रहने का हुक्म दिया । दोनों चुप हो गये ।

 नजाशी ने हजरत जाफ़र तैयार से कहा , तुम्हारे नबी पर कोई किताब  भी नाज़िल हुई है ?

 हजरत जाफ़र तैयार ने जवाब दिया , हां हमारे मोहतरम नबी पर कुरआन मजीद नाजिल हो रहा है ?

 उस ने फिर पूछा , तुम्हें कुरआन का कोई हिस्सा याद है ?

याद है ।

 तो सुनाओ ।

तमाम मुसलमान हाथ बांध कर खड़े हो गये । हज़रत जाफ़र ने सूरः  मरयम की तिलावत शुरू की । आप ने बड़ी अच्छी आवाज़ में पढ़ना शुरू  किया , जिस में कहा गया था -

तेरे परवरदिगार की रहमत बन्दा जकरिया को याद करती है । जिस वक्त उस ने अपने पालनहार को धीरे से पुकारा । उस ने कहा , ऐ परवर दिगार ! मेरी हड्डियां सुस्त हो गई हैं , मेरे सर ने बुढ़ापे का शोला मारा  है  और मेरे परवरदिगार ! मैं तुझे पुकारने में बद - नसीब न था और मैं डरता हु की मेरा कोई वारिस नहीं है  । मेरी औरत बांझ है । ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे अपने पास से वली बख्श , ताकि मेरा वारिस हो और ऐ
मेरे परवरदिगार ! उसे पसन्दीदा कर ।

 हजरत जाफ़र तैयार इतनी अच्छी आवाज़ में कुरआन मजीद पढ़ रहे  थे कि तमाम दरबार उस प्यारी आवाज़ से भर गया । नजाशी , वज़ीर , दरबारी सब सर झकाये बैठे बड़ी तवज्जोह से सुन रहे थे । नजाशी की  शान कह रही थी कि वह बहुत कुछ जब्त कर रहा है , उस से न रहा गया और बेक़ाबू हो कर उस के आंसू जारी हो गये ।

हजरत जाफ़र कुछ और आयतें पढ़ कर खामोश हो गये । देर तक  आप की आवाज गूंजती रही । कुछ देर बाद नजाशी ने सर उठाया , रेशमी रूमाल से आंसू पोंछा और कहा -

खुदा की क़सम ! इस कलाम से सच्चाई की बू आती है । यह ऐसा ही कलाम मालूम होता है , जैसा कि तौरात में है । मैं इक़रार करता हूं कि  हैं यह कलाम इंसान का कलाम नहीं है , बल्कि यह खुदा का कलाम है ।

 नजाशी के इन लफ्ज़ों से जहां मुसलमान इसलिए खुश हुए कि उन्हें  उम्मीद हुई कि शाह नजाशी उन्हें कुरैश के वपद के हवाले न करेगा , वपद ! वालों को यह डर हुआ कि शायद वे यहां से नाकाम हो जाएंगे ।

 अम्र  बिन आस ने नजाशी से कहा , हुजूर ! ग़ज़ब तो यही है कि जब  वह कलाम पढ़ते हैं , जो मुहम्मद (सल्ल०) उन को लिख कर देता है , तो  सुनने वाले पर बड़ा असर होता है । यह कलाम खुदा का कलाम नहीं है , बल्कि मुहम्मद का कलाम है ।

 हज़रत जाफ़र तैयार को अम्र की इस बेहूदा बात पर बड़ा गुस्सा आया है हैं और गुस्से की वजह यह थी कि अम्र अच्छी तरह जानता था कि हुजूर  सल्ल. अनपढ़ हैं , लेकिन नजाशी को धोखा देने के लिए अब कह रहा था  कि वह लिख कर देते हैं । उन्हों ने जोश में आकर कहा , अम्र ! सच है बोलो , क्या तुम नहीं जानते कि हुजूर उम्मी अनपढ़ ) हैं ।

 नजाशी भी बोल पड़ा , लगता है , तुम झठ बोलते हो । जब तुम इस  बात के क़ायल हो कि वह लिखना - पढ़ना नहीं जानते , तो एक अनपढ़ का  कलाम इतना जोरदार हो सकता है ? तास्सुव ने तुम को अन्धा कर दिया  हैं । तुम सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनते हो ।

 अम्र डर गया । उसे डर हुआ कि शायद नजाशी उसे और उस के  साथियों को दरबार से न निकलवा दे । उस ने फ़ौरन कहा , एक बात  कहने की रह गयी है ।

नजाशी ने पूछा , वह क्या है ?

 अम्र ने कहा , ये लोग हजरत ईसा के बारे में बुरी - बुरी बाते कहते है ।


उन्हें खुदा का बेटा नहीं मानते ।

 एक पादरी ने खड़े होकर अम्र के इन लफ्ज़ों की ताईद की और कहा , हैं यह बात बिल्कुल सही है । ये नये मज़हब के मानने वाले खुदावन्द ( हज़रत  ईसा ) की शान में गुस्ताखी की बातें करते हैं ।

यह सुन कर नजाशी को गुस्सा आ गया । उस ने हज़रत जाफ़र तैयार हैं से कहा कि क्या यह सही है कि तुम हज़रत ईसा की शान में गुस्ताखी करते  थे ?

 हजरत जाफ़र तैयार ने पूरी हिम्मत से काम लेते हुए जवाब दिया , यह बात भी गलत है । हम ईसा अलैहिस्सलाम को नबी मानते हैं और उनके की शान में वही कहते हैं , जो खुदा ने उन की शान में फ़रमाया है ।

 क्या है ? नजाशी ने कहा ।

हज़रत जाफ़र ने कहा , अल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया , ' वह अल्लाह के बन्दे और उस के रसूल हैं और उस का हुक्म हैं , उन को मरयम की तरफ़  डाल दिया और रूह की तरफ़ से हैं

नजाशी ने कहा , खुदा की क़सम ! इंजील में भी यही लिखा है । तुम  सच कहते हो ।

अब अम्र को यक़ीन हो गया कि नजाशी मुसलमानों को उन के हवाले हैं न करेगा । उस ने कहा , बादशाह ! हमारे यह आदमी हैं , जो हम से , हैं अपनी क़ौम से और अपने मुल्क और अपने माबूदों से बाग़ी होकर भाग  आए हैं , इसलिए आप इन को हमारे हवाले कर दें , यही बेहतर है ।

 नजाशी को जोश आ गया , बोला , हरगिज नहीं , उन्हें मेरे मुल्क से कोई  ताक़त नहीं लेजा सकती । तुम मुझको लालच देने के लिए ये तोहफ़े लाये हो , हैं इनको वापस ले जाओ और कुरैश के सरदारों से कह दो कि हब्शा का बादशाह एक मुस्लमान को भी तुम्हें वापस न देगा और ऐ मुसलमानो !  तुम आजाद हो , पूरी वे - फ़िक्री से तुम यहां रहो । जब तक मैं जिंदा हु , कोई तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता ।

हज़रत जाफ़र तैयार और तमाम मुसलमानों ने नजाशी का शुक्रिया  अदा किया । वह नजाशी के दरबार से विदा होकर अपने ठहरने की जगहों  पर चले गये ।

 कुरैशी वफ्द तमाम तोहफ़ों को लेकर बड़ी बद - दिली से विदा हुआ  और उसी दिन जहाज़ पर बैठ कर जद्दा की तरफ़ रवाना हो गया ।

https://alameainah.blogspot.com/2019/04/habsha-ki-hizrat.html

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