हजरत अमीर हमजा इस्लाम की गोद में (Hazrat Amir Hamza in the lap of Islam)
यह वफद जहा पहुंच कर मक्का की तरफ़ रवाना हुआ ।
मक्का वालों को पूरा यक़ीन था कि हब्शा का बादशाह नजाशी मुसलमानो को वफ्द के हवाले कर देगा । उन्होंने तै कर लिया था कि अब तमाम मुसलमानों को कैद कर देंगे , ताकि वे बाहर न जा सके , न किसी से मिल सकें । चाहते तो यह थे कि तमाम मुसलमानों को क़त्ल कर डालें , लेकिन मुसलमान किसी एक क़बीले से ताल्लुक़ न रखते थे , इस लिए उन्हें यह अंदेशा था कि अगर एक क़बीला भी किसी एक मुसलमान के खून का बदला लेने के लिए उठ खड़ा हुआ , तो फिर तमाम क़बीलों में लड़ाई छिड़ जाएगी और चूंकि आए दिन की लड़ाइयों ने उन का तमाम कस - बल निकाल दिया था , इसलिए वे किसी एक लड़ाई के लिए भी तैयार न थे , जिस से कि तमाम अरब में आग लग जाए और अरब का अम्न व अमान है खाक में मिल जाए ।
इस डर से , वे मुसलमानों को क़त्ल करने में हील - हुज्जत कर रहे थे । उन्हों ने यह तै कर लिया था कि जितने मुसलमान हैं , उन सब को एक हैं जगह जमा कर के कैद कर दें और बहुत कड़ाई से उन की निगरानी की जाए ।
यह ख्याली पुलाव पका ही रहे थे कि वफद आ गया और उस ने अपनी नाकामी की पूरी दास्तान कुरैश को कह सुनायी । वफ्द के नाकाम आने से । मक्का के तमाम काफ़िरों को बड़ा रंज हुआ । हब्शा के बादशाह नजाशी पर भी गुस्सा आया , पर उनमें इतनी ताक़त नहीं थी कि हब्शा के बादशाह पर चढ़ाई कर देते और उस से तलवार के बल पर अपनी मांग मंजूर करा सकते । इस लिए ख़ामोशी को ही बेहतर समझा । उन्हें यह डर हुआ कि ? शायद हब्शा के मुसलमान मसीही बादशाह नजाशी को मक्के पर न चढ़ा लायें । इसलिए उन्हों ने खुफ़िया तरीके से लड़ाई की तैयारियां शुरू कर दीं और जद्दा में सुराग़रसां भेज दिये , ताकि जब वे ईसाई फ़ौज को आता देखें , तो मक्के वालों को खबर कर दें ।
इस इन्तिजाम के बाद उन्हों ने उन मुसलमानों पर जो मक्के में रह गये थे और रसूल सल्ल० की मुहब्बत की वजह से हिजरत न कर सकते थे , इतनी सख्तियां शुरू कर दीं कि उन्हें जिंदगी से मौत कहीं अच्छी नजर आने लगी । मक्का के काफ़िरों ने यह कोशिश की कि मुसलमानों को खाने - पीने का सामान न मिल सके , इसलिए दुकानदारों को हिदायत कर दी कि कोई चीज किसी मुसलमान के हाथ किसी क़ीमत पर हरगिज़ न बेचें और बाक़ी पर भी पहरा बिठाया गया । इस से मुसलमानों को बेहद तक्लीफ़ का सामना करना पड़ा । कई - कई दिन तक खाना न मिलता था और प्यास बुझाने को पानी भी हाथ न आता था , इसलिए वे घरों में भूखे और प्यासे छिपे बैठे रहते । बाहर निकलते तो आवारा और बदमाश हैं लड़के उन के पोछे लग जाते , उन्हें मारते , गालियां देते , यहां तक कि कपड़े फाड़ डालते । मुसलमान बड़ी तक्लीफ़ और परेशानी में थे ।
मगर वे ऐसे अक़ीदे के पक्के थे कि सख्तियां बर्दाश्त कर रहे थे । मुसीबतों पर मुसीबतें झेल रहे थे , लेकिन कदम न डगमगाते थे । कुफ्फ़ारे हैं मक्का इस से और हैरान व परेशान रहते थे ।
एक दिन हुजूर सल्ल० लोगों की नजरों से छिप कर सफ़ा पहाड़ पर जा पहुंचे ।
अस्र का वक्त हो गया था । आप एक घाटी में नमाज पढ़ने लगे । इत्तिफ़ाक़ से अबु जहल उधर आ निकला । आप को नमाज़ पढ़ते देख कर खड़ा हो गया और गैज़ व गजव भरी नज़रों से हुजूर सल्ल० की तरफ़ देखने लगा ।
जब आप सल्ल० नमाज़ से फ़ारिग हुए तो अबू जहल बढ़कर आप के पास पहुंचा और गुस्ताखी के साथ बोला , मुहम्मद ! तेरी जात ने तमाम क़ौम और सारे अरब को बड़े फ़ित्ने में डाल रखा है । क्यों न आज मैं तेरा खात्मा कर डालूं ? ।
आप खामोश रहे ।
इत्तिफ़ाक़ से अबू जहल की एक लौंडी भी उधर से आ निकली । वह एक चट्टान के पीछे छिप कर देखने लगी कि अबू जहल मुहम्मद के साथ क्या सुलूक करता है ?
जब हुज़र सल्ल० ने अबू जहल को कुछ जवाब न दिया , तो उस ने फिर कहा , मुहम्मद , तुम ने क़ौम को बेहद मुश्किलों में डाल रखा है ।
आप ने फ़रमाया , अबू जहल ! मैं ने क़ौम को मुश्किलों में फंसा दिया है या कोम ने मुझे और मुसलमानों को मुसीबत में डाल रखा है ? अबू जहल बोला , अगर तु इस्लाम की तब्लीग़ छोड़ दे , तो हम तुझे मक्के का वादशाह बना दें ।
मैं बादशाही नहीं चाहता । आप ने फ़रमाया ।
जितनी दौलत कहो , तुम्हें दे दें । अबू जहल ने कहा
खुदा की कसम ! मुझे दौलत की परवाह नहीं है । आप ने फ़रमाया ।
खुदा के नाम से काफिरों को चिढ़ थी । अबू जहल भी खुदा का नाम सुनकर फुकारें मारने लगा । खूब जी भरकर आपकी शान में गुस्ताखी की, बुरा - भला कहने लगा ।
हुजूर सन० खामोश बैठे रहे ।
अबू जहल का गुस्सा बढ़ता गया । गुस्से में आ कर एक पत्थर उठाया और अपनी पूरी ताक़त से खींच मारा । पत्थर आप की पेशानी पर पड़ा । खून का फ़व्वारा उबल पड़ा और आप लहूलुहान हो गये । आप हाथ से खून पोंछते जाते थे और कहते जाते थे कि अबू जहल ! तुम मुझको जितना भी सता सकते हो , सता लो । मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं ।
अबू जहल डर गया कि आप कहीं शहीद न हो जाएं , जिसकी वजह में बनी हाशिम खानदान उस से , उस के खानदान से , साथ ही उस के क़बीले से हुजूर सल्ल० का बदला ले ले । इसलिए वह इधर - उधर देखते से हुए वहां से चल पड़ा उस के चले जाने के बाद हुजूर सल्ल० भी उठे और है अपने मकान की ओर चल पड़े ।
अबू जहल की बांदी ने इस पूरे वाक़िए को अपनी आंखों से देखा । उसे अबू जहल पर बड़ा गुस्सा आया ।
उस वक्त सूरज डूब गया था , अंधेरा फैल रहा था । बांदी भी खाना काबा की तरफ़ चल पड़ी । वहां उसे अमीर हमजा मिल गये । अमीर हमज़ा हुजूर सल्ल० के चचा और दूध शरीक भाई भी थे । वह वही शिकार का शौक़ पूरा कर के खाना काबा का तवाफ़ करने आये थे ।
बांदी ने अमीर से कहा , ऐ अमीर ! ठहर जाओ , मुझे आप से कुछ है कहना है । हजरत हमजा खड़े हो गये , बोले , क्या कहना चाहती हो ?
उस ने कहा , क्या मुहम्मद सल्ल० तुम्हारे भतीजे और दूध शरीक भाई नहीं हैं ?
क्यों नहीं ? हज़रत हमजा बोले ।
क्यों आप को उन से मुहब्बत नहीं है ? बांदी ने पूछा ।
मुझे उन से बहुत ज्यादा मुहब्बत है ।
अफ़सोस है , ऐ अमीर ! बांदी ने कहा , तुम्हारे भतीजे पर लोग बेजा तख्तियां करते हैं और तुम को परवाह तक नहीं होती । अभी मुहम्मद सल्ल० सफ़ा की पहाड़ी पर बैठे थे । अब जहल ने उन को सैकड़ों गालिया दीं । जब हुजूर सल्ल० ने जवाब न दिया , तो उस ने एक बड़ा पत्थर उठा कर उन के सर पर दे मारा । उन का सर फट गया और खून का फ़व्वारा बह निकला ।
बांदी की इस बात से अमीर हमज़ा को जोश आ गया । बोले , मैं अभी उस कमबख्त से जा कर बदला लेता हू ।
यह कह कर वह आगे बढ़ गये ।
अबू जहल अपने दोस्तों में घिरा बैठा था ।
अमीर हमज़ा अबु जहल के पास पहुंच गये , गुस्सा तो था ही , कमान उठा कर इस जोर से उस के सर पर मारी कि उस का सर फट गया , फिर गरज कर बोले , अबु जहल ! सुन , मैं मुहम्मद सल्ल० के दीन पर है ईमान लाया हूं । वोल , अगर तेरी कोई हिम्मत हो ।
हज़रत हमज़ा के गुस्से और जलाल को देख कर अबु जहल कांप गया , बोला , अमीर ! मुझ से वाक़ई गलती हुई ।
अमीर हमजा का गुस्सा ठंडा हुआ तो हुज़ूर सल्ल० को देखने और तबियत मालूम करने आप के मकान की तरफ़ चल पड़े । वहां देखा कि हजरत ख़दीजा और हज़रत फ़ातिमा हजरत मुहम्मद सल्ल० का सर धो रही हैं और कपड़े को घाव में भरने के लिए जला रखा है ।
हजरत अमीर हमजा आप के पास बैठ गये । आप ने हमदर्दी के अंदाज़ में कहा ।
मेरे प्यारे भतीजे ! तुम को सुन कर बहुत खुश होना चाहिए कि मैं ने बढ़कर अबू जहल से तुम्हारा बदला ले लिया और इस ज़ोर से उस के सर पर कमान मारी कि उस का सर फट गया ।
हुजूर सल्ल० ने हज़रत अमीर हमजा की ओर देख कर फ़रमाया - - -
ऐ चचा ! मुझे इस बात से खुशी नहीं हो सकती कि आप ने मेरा वेदला ले लिया है , मुझे तो खुशी उस वक्त होगी , जब आप इस्लाम में दाखिल हो जाएंगे ।
हज़रत हमजा हुजूर सल्ल० की हालत और हज़रत फ़ातमा के रोने की कैफ़ियत देख कर पहले ही नर्म पड़ चुके थे , बे - अख्तियार बोले , अगर तुम्हारी यही खुशी है , तो मुझे यह भी मंजूर है , तुम मुझे मुस्लमानकर लो ।
हुजूर सल्ल० इस बात से खिल उठे । आप अपने ज़ख्म की टींसे भूल गए और मारे खुशी के फ़ौरन अमीर हुमज़ा की तरफ़ मुतवज्जह हुए , उन्हें कलिमा पढाया और हजरत हमजा मुसलमान हो गये । यह वाकिया सन ०६ नबवी का है ।
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